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काले सोने की रखवाली में छूटे घर, खेत बने आ​शियाना

अफीम के खेतों में पौधों पर फूल खिलने व डोडों के बनने के साथ ही किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसान फसल की सुरक्षा में हर समय खेतों पर रहने लगे हैं, किसानों ने खेतों पर झोपड़ियां बना ली हैं , उनका करीब तीन माह तक अब खेतों में ही डेरा रहेगा। किसानों को अब अफीम तस्करों के साथ ही पशु पक्षी, मवेशियों व नीलगायों से भी अफीम की फसल को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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काले सोने की रखवाली में छूटे घर, खेत बने आ​शियाना

काले सोने की रखवाली में छूटे घर, खेत बने आ​शियाना

भीलवाड़ा जिले के मांडलगढ़, कोटड़ी, बीगोद, सवाईपुर, बिजौलियां व जहाजपुर क्षेत्र में अफीम के खेतों में पौधों पर फूल खिलने व डोडों के बनने के साथ ही किसानों की चिंता बढ़ गई है। किसान फसल की सुरक्षा में हर समय खेतों पर रहने लगे हैं, किसानों ने खेतों पर झोपड़ियां बना ली हैं , उनका करीब तीन माह तक अब खेतों में ही डेरा रहेगा। किसानों को अब अफीम तस्करों के साथ ही पशु पक्षी, मवेशियों व नीलगायों से भी अफीम की फसल को बचाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

सवाईपुर के किसान सुखदेव कुमावत बताते है कि काला सोना ( अफीम ) की फसल की देखरेख के लिए अब किसान सावचेत हो गया है, उसने अफीम की फसल को शीतलहर से बचाने के लिए खेतों में बांस बैरसिया बांधना शुरू कर दिया है, किसान फसल को शीतलहर की चपेट में आने से बचाने के लिए अफीम की फसल की चारों तरफ प्लास्टिक या कपड़े से चार ओर पर्दा कर रहे हैं, साथ ही चारों तरफ मक्के की बुवाई की है, ताकि शीतलहर की चपेट अफीम की फसल तक ना पहुंच पाए।

किसान सुरेश आचार्य ने बताया कि अफीम की फसल को बचाने के लिए विभिन्न प्रकार के जतन करने पड़ते हैं, फसल को सबसे ज्यादा जंगली जानवरों व नीलगायों से खतरा है । जिसके लिए किसान फसल के चारों तरफ तिरपाल लगाकर या तारबंदी कर फसल को बचाया जा रहा है, साथ ही कई किसान पटाखे जलाकर भी फसल की रखवाली कर रहे है।

किसान सत्यनारायण शर्मा बताते है कि खेतों में अफीम की फसल लहरा रही और उस पर फूल खिलने के साथ ही डोडे बनने लगे है, जिससे किसानों में खुशी हैं। फसल को तोतों से भी बचाना एक कठिन कार्य हो रहा है, जिसके लिए किसान पूरी अफीम की फसल के ऊपर जाली लगाकर बचाव कर रहे, नहीं तो तोते डोडे को चट कर जाते हैं, जिससे किसान को काफी नुकसान होता है।


अफीम किसान संघर्ष समिति चितौड़ प्रांत के अध्यक्ष बद्री लाल तेली बताते है कि अफीम की फसल पर फूल खिलने व डोडा बनने के साथ ही अफीम काश्तकारों ने खेत की मेड़ों पर रहने के लिए झोपड़ियां बना दी है, जिसमें किसान परिवार रात भर फसल की रखवाली कर रहा है, यहां उनका सोना, खाना, पीना भी शुरू हो गया है। वही शीतलहर से अफीम के डोडे प्रभावित होने लगे है। इससे उत्पादन पर प्रभाव पड़ने की आशंका से अफीम किसानों में मायूसी है।