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इंजेक्शन लगाने के लिए भी यहां करना पड़ता है मरीज को भर्ती, इमरजेंसी में नहीं नर्सिंग स्टाफ

मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (जनाना अस्पताल) में पांच माह बाद भी प्रसूता और नवजात को सुविधाएं मयस्सर नहीं

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मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (जनाना अस्पताल) में पांच माह बाद भी प्रसूता और नवजात को सुविधाएं मयस्सर नहीं

भीलवाड़ा।

16 करोड़ रुपए की लागत से तैयार मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (जनाना अस्पताल) में पांच माह बाद भी प्रसूता और नवजात को सुविधाएं मयस्सर नहीं है। आउटडोर समय के बाद अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ रहा है। आपातकालीन कक्ष में केवल एक चिकित्सक सेवाएं देते है, जिनके पास भी नर्सिंग स्टॉफ नहींं है। एेसे में आपातकालीन कक्ष में पहुंच रहे मरीजों को इंजेक्शन भी लगाना हो तो भर्ती ही होना पड़ेगा।

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महात्मा गांधी अस्पताल परिसर में बने जनाना अस्पताल को जिला प्रशासन ने आनन-फानन में शुरू किय था लेकिन पांच माह बाद भी सुविधाएं नहीं मिल पा रही है। गर्भवती महिला को जी मिचलाने व बच्चे को पेट दर्द होने जैसी तकलीफ पर भी इंजेक्शन लगाना हो तो भर्ती होना पड़ता है। लिहाजा कई बार मरीज को परिजन सीधे महात्मा गांधी अस्पताल ले जाते है लेकिन वहां से उन्हे यहां भेज दिया जाता है।

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इंजेक्शन व दवाएं भी नहीं है उपलब्ध
आपात चिकित्सा कक्ष में केवल डॉक्टर रूम है। यहां न नर्सिंग स्टॉफ है और ना ही इंजेक्शन व दवा। एेसे में चिकित्सक हर पांचवें मरीज को इंजेक्शन देने के लिए भर्ती करने को मजबूर हैं। कई बार इंजेक्शन न लगने से स्थिति गंभीर हो जाती है। आउटडोर के साथ ही दवा केन्द्र भी बंद हो जाता है। आपात कक्ष में इलाज को आने वाली महिलाओं व बच्चों की दवा लेने के लिए परिजनों को एमजीएच भेजा जाता है।

एमसीएच केवल वार्ड
एमसीएच केवल वार्ड है, अलग से अस्पताल नहीं है। आपातकालीन कक्ष में एक डॉक्टर है। नर्सिंग स्टाफ लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। मरीजों को अगर परेशानी हो रही है तो एमजीएच आपातकालीन कक्ष स्टाफ को इंजेक्शन व अन्य सुविधाएं देने को पाबन्द किया जाएगा।
डॉ. एसपी आगीवाल, पीएमओ, महात्मा गांधी चिकित्सालय