
कस्बे में एेतिहासिक नाहर नृत्य इस वर्ष 15 मार्च को होगा। यह 405वां आयोजन है। नाहर नृत्य कस्बे में शेष सहाय धाम व दशहरा चौक में मनाया जाएगा।
माण्डल।
कस्बे में एेतिहासिक नाहर नृत्य इस वर्ष 15 मार्च को होगा। यह 405वां आयोजन है। नाहर नृत्य कस्बे में शेष सहाय धाम व दशहरा चौक में मनाया जाएगा। तैयारियों को अंतिम रूप दिय जा रहा है। 1614 ईस्वी में मुगल बादशाह जहांगीर का शहजादा खुर्रम शाहजहां महाराणा अमर सिंह से संधि करने मेवाड़ आए तो यहां तालाब किनारे पड़ाव डाला। खुर्रम के मनोरंजन के लिए यहां के श्रेष्ठ कलाकारों ने नाहर नृत्य किया।
जो भरपूर मनोरजंन देने के साथ यादगार बन गया। यह स्वांग शेरों का था। जिससे यहां वीरों की शक्ति और बुद्धिमता का परिचय मिल सके। इस नृत्य को देखकर बादशाह बहुत खुश हुए। इसे जारी रखने के लिए पाराशर वंशजों को शाही पत्र भेंट किया। जो आज भी कस्बे के पण्डित कंवर लाल पाराशर के पास है। तब से नाहर नृत्य वार्षिक उत्सव के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाने लगा।
रूई चिपकाकर धरते हैं रूप
नृत्य में अलग-अलग समाज के चार पुरूषों को शरीर पर दूधिया रूई चिपका नाहर का रूप धारण किया जाता है। सिर पर दो सिंग भी लगाए जाते हैं। साथ ही लाल लंगोट तथा सिर पर टोपा पहने भोपा होता है। मोरपंख की छुवन से यह सबको सावचेत करता है। कर्ण प्रिय वाद्ययन्त्र, जंगी ढोल नगाड़ों ध्वनी व बांक्या ढोलक की मधुर झंकार पर धीरे-धीरे नाचते आगे बढते जाते है। बीच-बीच मे धडूम की आवाज कर मनोरंजन करते हैं।
खेलते हैं होली, निकलती है खाटली
कस्बे में रंग तेरस पर घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। सुबह से ही रंग-गुलाल लेकर एक दूसरे को रंग लगा अपनी खुशी का इजहार करते हैं। दोपहर में धूमधाम के साथ तालाब की पाल व सदर बाजार से खाटली पर बैठाबादशाह-बेगम की सवारी निकाली जाती है। रास्ते में महिलाएं डोलचियों में पानी भर कर उनको रंग लगाती है। दोनो ही टोलियां तहसीलदार के पास जाती है, जहां बादशाह-बेगम बने कलाकार तहसीलदार से नजराना लेते हैं। तहसीलदार भी उनको रंग-गुलाल लगा कर उनका स्वागत करते हैं।
Published on:
11 Mar 2018 11:25 pm
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