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संयम का तात्पर्य है चारित्र-आचार्य महाश्रमण

आचार्य ने किया संयम के प्रकारों का वर्णन

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संयम का तात्पर्य है चारित्र-आचार्य महाश्रमण

संयम का तात्पर्य है चारित्र-आचार्य महाश्रमण

भीलवाड़ा।
आचार्य महाश्रमण के पावन सान्निध्य में जैन आगम ठाणं पर आधारित अमृतमय देशना से श्रावक-श्राविकाओं को अध्यात्म का नव आलोक मिल रहा है। आचार्य ने प्रतिपादित तत्वज्ञान की व्याख्याओं से जन-जन लाभान्वित हो रहा है। आचार्य महाश्रमण ने कहा कि संयम का तात्पर्य है चारित्र। सर्व चारित्र साधु में होता है और श्रावक में देश चारित्र विद्यमान होता है। चारित्र के पांच प्रकार बताए गए है। सामायिक, सूक्ष्म संपराय, छेदोपस्थानीय, यथाख्यात, परिहार विशुद्धि चारित्र। अंश रूप से आरंभ -समारंभ से निवृत होने वाला देशव्रती श्रावक कहलाता है और पांचों चारित्र का पूर्णरूपेण पालन करने वाला साधु कहलाता है। चार चारित्र सामायिक चारित्र के ही विशिष्ट रूप है। आचार गुण संबंधी भिन्नता के कारण इन्हें भिन्न श्रेणी में रखा गया है। साधु की सामायिक में सर्व सावद्ययोग का त्याग होता है परंतु श्रावक के सर्व सावद्य योग का त्याग प्रत्यक्ष रूप से हो सकता है पर अप्रत्यक्ष रूप से नही हो सकता इसलिए साधु का त्याग बड़ा होता है।
संयम चारित्र के दो मूल भेद है। सराग संयम, वीतराग संयम। सराग संयम में आयुष्य का बंध हो सकता है, वीतराग संयम में फिर आयुष्य का बंध नही होता है। आचार्य ने तेरापंथ धर्मसंघ के षष्टम आचार्य माणक गणी का जीवन वृत माणक महिमा का संगान किया।