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जीवन में संयम का बंधन जरूरी-आचार्य महाश्रमण

भारतीय संस्कृति में खास पहचान रखता रक्षाबंधन

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जीवन में संयम का बंधन जरूरी-आचार्य महाश्रमण

जीवन में संयम का बंधन जरूरी-आचार्य महाश्रमण

भीलवाड़ा।
रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति में खास पहचान रखता है। आचार्य महाश्रमण ने रविवार को धर्मसभा में रक्षाबंधन पर विशेष उद्बोधन दिया। आचार्य ने कहा कि संसार में भाई बहन का संबंध होता है। आज के दिन रक्षा के प्रतीक रूप में बहनें भाई की कलाई पर राखी भी बांधती हैं। भाई का बहन के प्रति दायित्व होता है तो बहन का भी भाई के प्रति अपना दायित्व है। अध्यात्म की दृष्टि से देखें तो पापों से आत्मा की रक्षा करें वो महत्वपूर्ण है। स्वयं स्वयं की रक्षा करे। यह रक्षाबंधन संयम का बंधन बन जाए तो पर्व की सार्थकता हो सकती है।
साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा ने भी प्रेरणा दी। प्रतिवर्ष श्रावणी पूर्णिमा विश्व संस्कृत दिवस के रूप में मनाई जाती है। संस्कृत भाषा से तेरापंथ का विशिष्ट जुड़ाव है। आचार्य संस्कृत भाषा के विद्वान है। संस्कृत रचनाओं की पुस्तकें पाठक वर्ग को अध्यात्म की गहराइयों का ज्ञान कराती हैं।
आचार्य ने कहा कि कितने ही जैन आगम साहित्य के संदर्भित ग्रन्थ संस्कृत में लिखे हुए है। आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ ने भी संस्कृत में अनेकों ग्रंथ लिखे। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा जी भी संस्कृत में विदुषी है।
आचार्य ने कहा कि संयम एक प्रकार का नियंत्रण है। जब तक संयम जीवन में नहीं आता, अहिंसा भी जीवन में नहीं आ सकती। संयम की दृष्टि से व्यक्ति को प्राणियों का संयम करना चाहिए। जैन दर्शन के अनुसार इनमें ऐसे सूक्ष्म जीवों का वास है जो प्रत्यक्षत: व्यक्ति को दिखाई नहीं देते। व्यक्ति को इनके अनावश्यक उपयोग से बचने का प्रयास करना चाहिए। दस तरह के संयम का उल्लेख किया।