
Urea system is being discontinued in diesel trucks
सुरेश जैन
केंद्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण कम करने के लिए बीएस-6 इंजन वाले भारी वाहनों में यूरिया (डीइएफ) डालना अनिवार्य किया है। नियम के अनुसार हर 100 लीटर डीजल पर 8 लीटर यूरिया डालना जरूरी है। यह डीजल इंजन से निकलने वाली जहरीली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड को निष्क्रिय कर हवा को सुरक्षित बनाता है। लेकिन हकीकत में यह नियम कागजों में सिमटकर रह गया है। प्रदेश के बड़े शहरों और ट्रांसपोर्ट नगरों में तुर्की व चीन से आए सॉफ्टवेयर के जरिए 40 से 50 हजार रुपए में ट्रक मालिक यह सिस्टम बंद करवा रहे हैं।
कैसे होता है खेल
ट्रक मालिक सॉफ्टवेयर इंजीनियरों से संपर्क कर ईसीयू (इंजन कंट्रोल यूनिट) मॉडिफाई करवा लेते हैं। इसमें प्रोग्राम बदलकर यूरिया की खपत शून्य कर दी जाती है। सॉफ्टवेयर के बाद वाहन बिना यूरिया के भी सामान्य डीजल पर चलते रहते हैं। वाहन नाइट्रोजन ऑक्साइड को सीधे वातावरण में छोड़ते हैं।
इंजीनियर ने खोला राज
भीलवाड़ा ट्रांसपोर्ट नगर में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हमारे पास कई ट्रक मालिक आते हैं। कई ट्रकों में यूरिया सिस्टम पहले ही बंद किया जा चुका है। ट्रांसपोर्ट मालिक इसे खर्च बचाने का तरीका मानते हैं। इंजीनियर के पास ऐसे वाहनों का पूरा डेटा और लिस्ट मौजूद है। प्रदेश में कई जगह गड़बड़ी हो रही है। इनमें भीलवाड़ा ट्रांसपोर्ट नगर, गंगरार, चित्तौड़गढ़ , उदयपुर, जयपुर, अजमेर सबसे ज्यादा ट्रकों में यूरिया सिस्टम बंद करवाने की पुष्टि हुई है।
पेट्राेल पम्प के पास ही होते हैं यूरिया फिलिंग स्टेशन
डीजल के वाहनों में यूरिया फिलिंग करवाने के लिए पेट्रोल पम्प के नजदीक ही यूरिया फिलिंग स्टेशन बनाए हुए हैं। डीजल वाहनों में डीजल टैंक के पास ही एक छोटा टैंक होता है जिसमें तरल यूरिया भरा जाता हैं।
खर्च बचाने की लालच
ट्रक चालक सप्ताह में दो से तीन बार यूरिया भरवाने को झंझट मानते हैं। एक लीटर यूरिया की कीमत औसतन 45 से 50 रुपए पड़ती है। एक लंबी दूरी तय करने वाले ट्रक पर महीने में 10 से 12 हजार अतिरिक्त खर्च आता है। इसी खर्च से बचने के लिए मालिक सिस्टम बंद करवाते हैं।
अधिकारियों को जानकारी ही नहीं
आरटीओ, डीटीओ और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व किसी भी विभाग को इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है। जब पूछा गया कि कार्रवाई कौन करेगा, तो स्पष्ट जवाब तक नहीं मिला। जिम्मेदारी इधर-उधर टाली जा रही है।
कारों में नहीं हो रही छेड़छाड़
कार मालिक बताते हैं कि एक बार यूरिया डालने पर कार 1 माह तक चल जाती है। कारों में खपत बहुत कम है, इसलिए लोग छेड़छाड़ की जरूरत नहीं समझते। समस्या सिर्फ भारी वाहनों में यूरिया की अधिक खपत से जुड़ी है।
स्वास्थ्य पर खतरनाक असर
नाइट्रोजन ऑक्साइड हवा में मिलकर धुंध (स्मॉग) और एसिड रेन पैदा करती है। इससे दमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, श्वास रोग बढ़ते हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर इसका असर और ज्यादा खतरनाक है। वाहनों से निकलने वाला 30 प्रतिशत प्रदूषण नाइट्रोजन ऑक्साइड गैस से आता है।
छेड़छाड़ करना गलत
सिस्टम से छेड़छाड़ कर यूरिया बंद करवाना गलत है। यूरिया पर्यावरण को जहरीली गैसों से बचाने का साधन है। थोड़े खर्च की बचत कर मालिक समाज और देश का बड़ा नुकसान कर रहे हैं।
विश्वबंधुसिंह राठौड़, अध्यक्ष भीलवाड़ा गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन
Published on:
25 Aug 2025 09:22 am
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