
200 years of Sanchi stupas searching
विदिशा. शांति के प्रतीक सांची के स्तूपों की खोज को 200 वर्ष पूरे हो गए हैं। सम्राट अशोक ने पत्नी देवी के कहने पर ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में इन्हें बनवाए थे। कालांतर में खंडहर हो जाने के बाद ये मलबे में दब गए। वर्ष 1818 में इनकी फिर खोज हुई। 1989 में सांची के स्तूपों को विश्व धरोहर में शामिल किया गया।
पुरातत्ववेत्ता डॉ. नारायण व्यास के मुताबिक आज भले ही सांची रायसेन का हिस्सा हो, लेकिन सम्राट अशोक के समय यह विदिशा का एक भाग था। अशोक की पत्नी देवी ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। उन्होंने पति से कहकर यहां स्तूप बनवाए थे। उस समय स्तूपों की इस पहाड़ी का नाम वैदिसगिरि था, जिसका अर्थ है विदिशा की पहाड़ी। यहां बने बौद्ध विहारों में ही देवी और अशोक की संतानें महेंद्र और संघमित्रा रहे। बाद में इस पहाड़ी का नाम काकनाय और श्रीपर्वत भी रहा। 11-12 वीं शताब्दी में यह स्थान खंडहर में तब्दील हो गया।
टेलर ने देखा, कनिंघम ने संवारा
डॉ. व्यास के मुताबिक सदियों तक मलबे में दबे इन स्तूपों को 1818 में भोपाल रियासत के ब्रिटिश पॉलीटिकल एजेंट जनरल टेलर ने सबसे पहले देखा। इसके बाद सर्वेयर जनरल कनिंघम ने 1853 में स्तूपों और आसपास के अवशेषों का सर्वे किया। उन्होंने अपनी पुस्तक भेलसा टोप्स को सांची के स्तूपों पर केंद्रित कर उसमें मुरेल खुर्द, सुनारी, सतधारा और अंधेर के स्तूपों का भी सर्वे कर उसका विवरण दिया। कनिंघम ने मलबे का उत्खनन कराकर स्तूपों को संवारा। उन्हें यहां भगवान बुद्ध के शिष्य सारिपुत्र और महामोग्दलायन व बौद्ध शिक्षकों की अस्थियां मिलीं।
नवाबी काल में बना संग्रहालय
कनिंघम के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पहले निदेशक सर जॉन मार्शल ने 1912-1919 तक स्तूपों का रखरखाव कराया। मार्शल के बाद 1942 में भोपाल रियासत के पुरातत्ववेत्ता अब्दुल हमीद ने स्तूपों का उत्खनन कराकर प्रमाणित किया कि अशोक की पत्नी देवी यहीं रहती थीं। नवाबी काल में स्तूप की पहाड़ी पर ही वहां से निकले अवशेषों का संग्रहालय बनाया गया। सांची के स्तूपों की खोज को 200 वर्ष पूरे होने पर सरकार ने 200 के नोट पर इनके चित्र प्रकाशित किए हैं।
Updated on:
05 Feb 2018 10:49 am
Published on:
05 Feb 2018 08:28 am
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