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रेजिडेंट डॉक्टर के 36 घंटे

जीएमसी की जूडा व कुछ एमबीबीएस स्टूडेंटस ने कालेज प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाते हुए करीब 40 शिकायती बेनाम चि_ियां पुलिस को सौंपी हैं। इसमें कहा गया है कि एक हफ्ते में 36 घंटे की दो ड्यूटी लगायी जाती है। 36 घंटे की शिफ्ट में ये फिक्स नहीं होता कब खाना खाएंगे,कब सोएंगे। 14 घंटे के बाद सोने के लिए 6 घंटे मिलना भी मुश्किल है। कभी-कभी तो 20-20 घंटे तक नहीं सो पाते। इसके बाद बेइज्जत किया जाता है। कहा जाता है सिस्टर्स और आया-बाई भी तुमसे बेहतर हैं। जरा सी गलती पर सबके सामने बेइज्जत किया जाता है।

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Bhopal. जीएमसी के एक जूनियर डॉक्टर ने 36 घंटे यानी एक शिफ्ट का दिनचर्या बतायी। नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने बताया कि उनकी ड्यूटी सर्जिकल इमरजेंसी से शुरू होती है। अगले ३६ घंटे की ड्यूटी की मानसिकता के साथ वह सुबह 8.50 बजे पहुंचते हैं। साथ में होती हैं सर्जरी की पाठ्यपुस्तके, ग्लूकोज बिस्कुट के पैकेट, कुछ फल और पानी की बोतलें। इमरजेंसी वार्ड में कम से कम 20 बिस्तरों पर इतने ही मरीज होते हैं। सुबह-सुबह भर्ती मरीजों की जांच करते हैं। जांच रिपोर्ट नोट करते हैं। कुछ मरीजों के टांके खुले होते हैं। डॉक्टर के आने के पहले घावों की सफाई करते हैं। रोगियों की कैनुला बदलते हैं। मरीजों के गुस्साए रिश्तेदारों से निपटते हैं। किसी की पेशाब की थैली लीक हो रही होती है तो किसी को कुछ और तकलीफ। सबकी बातें सुनते हैं। परिजनों को संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं। 10 बजे के करीब सीनियर डॉक्टर राउंड पर आते हैं। उन्हें मरीजों की हालत के बारे में बताते हैं। इसके बाद आपातकालीन ओटी के सर्जरी शुरू में जाते हैं। यहां कम से कम दो घंटे लगते हैं। तब तक बाहर बेचैन भीड़ इंतजार कर रही होती है। उनसे निपटते हैं तब तक ३ बज चुके होते हैं। सीनियर डॉक्टर के जाने का समय हो चुका होता है। वे तमाम निर्देश देकर जाते हैं। उन्हें फॉलो करना होता है। नर्स को निर्देश देना होता है। इस बीच समय मिला तो पुस्तकें पलटते हैं। एक घंटे के ब्रेक के बाद फिर से मरीजों का राउंड और सीनियर डॉक्टर का इंतजार। मरीजों की चीख-पुकार। परिजनों का गुस्सा। दवाइयों की डोज और घावों का रिसाव। इन सबके बीच अपने लिए कुछ भोजन का इंतजाम। रात्रि की पाल में इमरजेंसी मरीज आ गए उन्हें संभालने में कम से कम ४ घंटे लग जाते हैं। थोड़े विश्राम के बाद सुबह-सुबह 4 बजे फिर कोई मरीज आ ही जाता है। उसका इलाज। सुबह 7.30 बजे फिर उबासियों के बीच राउंड। 24 घंटे की डयूटी के बाद अगली ड्यूटी शिफ्ट की तैयारी। और फिर वही भागम-भाग जिंदगी। यह उस डॉक्टर की व्यथा है जिसकी पीजी की पढ़ाई पर सरकार करीब 1.10 करोड़ खर्च करती है।