
Non-Attainment Cities प्रतिकात्मक फोटो (Photo Source- freepik)
MP News: नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के तहत वायु प्रदूषण के चलते प्रदेश के आठ शहरों को नॉन-अटेनमेंट सिटी के दायरे में रखा गया है। यहां प्रदूषण कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है। ताजा रिपोर्ट में इंदौर और सागर में 2025 में पीएम-10 घटने की बजाय बढ़ गया। एनजीटी द्वारा गठित समिति ऐसे आठ शहर भोपाल, इंदौर, ग्वालियर, जबलपुर, उज्जैन, सागर, सिंगरौली और देवास में प्रदूषण कम करने का काम कर रही है।
सबसे ज्यादा जोर सड़कों की धूल और वाहनों का प्रदूषण कम करने पर है। यहां सड़कों की सफाई ब्लोअर की बजाय सक्शन वाली स्वीपिंग मशीनों से होगी। एनजीटी ने राशिद नूर खान की याचिका पर नगरीय विकास, परिवहन, पर्यावरण विशेषज्ञ आदि को शामिल कर एक समिति गठित की थी। समिति ने कई स्थानों का निरीक्षण और अपनी सिफारिशें एनजीटी को सौंपी है। भोपाल में सोर्स अपॉर्शनमेंट स्टडी संस्थान पुणे के विशेषज्ञों की भी मदद ली गई। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के अंतर्गत पीएम-10 (पर्टिकुलेट मैटर) के स्तर में 40 प्रतिशत तक कमी या 60 माइक्रोग्राम प्रति ऋयूबिक मीटर वार्षिक की उपलब्धि हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
समिति में डॉ. रवि प्रकाश मिश्रा, अपर आयुक्त नगरीय प्रशासन शिशिर गेमावत, उप आयुक्त परिवहन किरण शर्मा, वैज्ञानिक-ई डॉ. सत्या, एप्को से डॉ. सुब्रता पाणी, एमपीपीसीबी से पीसी उचारिया शामिल हैं। वाहन प्रदूषण रोकने में नगरीय प्रशासन के अलावा टाउन एण्ड कंट्री प्लानिंग, परिवहन विभाग के साथ ट्रैफिक पुलिस की भी जवाबदेही तय होगी।
नॉन-अटेनमेंट सिटी ऐसे शहर होते हैं जो लगातार कई सालों (आमतौर पर 5 साल से ज्यादा) से राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों को पूरा नहीं कर पाते हैं। वहां प्रदूषण कम करने के लिए विशेष कार्य योजनाएं बनती हैं।
पीएम 10: ऐसे कण जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये धूल, मिट्टी, सीमेंट, परागकण आदि से बनते हैं। ये कण नाक और गले तक आसानी से पहुंच जाते हैं।
पीएम 2.5: इसका मतलब है ऐसे कण जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये बहुत ही सूक्ष्म होते हैं। बाल की मोटाई से लगभग 30 गुना छोटे। ये फेफड़ों में पहुंचकर गंभीर बीमारी का कारण बनते हैं।
Published on:
19 Apr 2026 08:51 am
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