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सावधान! गूगल सर्च इंजन आपको बना रहा ‘डॉक्टर शॉपिंग’ का मरीज

- इंटरनेट की लत है बुरी... बड़े तो बड़े बच्चे भी हो रहे 'डॉक्टर शॉपिंग' के एडिक्ट- सामान्य सी बीमारियों को गूगल सर्च इंजन ने बना दिया विकराल, एंग्जायटी के चलते बदलने लगे डॉक्टर पर डॉक्टर- प्रदेश के तीन अजीबोगरीब केस... दादाजी की हार्ट अटैक से मौत तो किसी का पारिवारिक झगड़े के कारण मन हुआ बीमार- प्रदेश के तीन डॉक्टरों के पैनल ने बताया- पिछले पांच साल से बढ़ा चलन, कोविड काल के बाद आई तेजी

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भोपाल@रूपेश मिश्रा

हर किसी के हाथ को अपना गुलाम बना चुके इंटरनेट के मार्फत दौडऩे वाले स्मार्ट फोन पर इंसान की निर्भरता इस कदर बढ़ गई है कि उसका अब मन और शरीर कई गंभीर बीमारियों का घर बनता जा रहा है। हद तो ये है कि इसके बाद भी इंसान गूगल पर अपनी बीमारी का इलाज ढूंढ़ रहा है।पिछले कुछ सालों में इसका चलन तेजी से बढ़ा है, जिसका नामकरण 'डॉक्टर शॉपिंग' हुआ है। दरअसल, सामान्य तौर पर सिरदर्द और मुंह में छाले होने पर भी इंसान इंटरनेट पर इसकी खोज करता है। इसमें कई बार सिरदर्द के लिए ब्रेन ट्यूमर और मुंह के छालों के लिए कैंसर के लक्षण बता दिए जाते हंै। ऐसे में पीडि़त खुद को मौत के मुहाने पर समझकर डॉक्टर पर डॉक्टर खोजने लगता है। उसकी अंतहीन दौड़ शुरू हो जाती है। इलाज और जांच में समय और श्रम लगता है सो अलग। लेकिन उसकोअसल में कोई दिक्कत होती ही नहीं है। प्रदेश के दो मनोचिकित्सकों के पैनल ने पत्रिका को बताया कि दिमाग में कैमिकल इनबैलेंस होने की वजह से सामान्य शारीरिक समस्याएं भी बड़ी-बड़ी बीमारी लगने लगती हैं। बीते आधे दशक में जैसे- जैसे इंटरनेट का क्रेज बढ़ा है और कोविड का भयावह दौर आया तब से 'डॉक्टर शॉपिंग' का चलन भी तेजी से बढ़ा है।

मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी से जानिए डॉक्टर शॉपिंग के प्रमुख लक्षण
- एक-एक समस्या या बीमारी की जांच को कई बार करवाते हैं।
- पुरानी फाइलों को ना बताकर डॉक्टरों का भी टेस्ट लेते हैं।
- कुछ पीडि़त 20 से 30 फाइल के साथ डॉक्टर के पास पहुंचते हैं।

मनोचिकित्सक डॉ. धीरेंद्र मिश्रा ने बताया कैसे बचें डॉक्टर शॉपिंग से
- गूगल से मिली जानकारी एक्सपर्ट एडवाइज नहीं होती है इसलिए बीमारी का इलाज इंटरनेट पर ना खोजें।
- विशेषज्ञ (डॉक्टर) की सलाह को मानें, संदेह जताते हुए कई डॉक्टरों से सलाह लेने से बचें।
- डॉक्टर के पास लक्षण लेकर जाएं न कि बीमार लेकर। आप खुद ही तय कर लें आपको कैंसर है।


प्रदेश के तीन अजीबोगरीब डॉक्टर शापिंग की केस स्टडी

मेडिकल केस स्टडी- 01
दिल की बढ़ी धड़कन को समझ बैठीं हार्टअटैक, करवाने लगीं जांच पर जांच
29 वर्ष की एक महिला को दिल की धड़कन बढ़ी हुई महसूस हुई। उन्होंने फौरन इंटरनेट पर सर्च किया तो उन्हें हार्टअटैक लिखकर आया। फिर उन्होंने पहले लोकल डॉक्टर से इसीजी करवाई, जो सामान्य आई। इस पर भरोसा नहीं हुआ तो नए कॉर्डियोलॉजिस्ट के पास गईं। वहां ईसीजी, टीएमटी, ईको की जांच करवाई। वहां भी सब जांचें सामान्य आईं लेकिन फिर भी तीसरे डॉक्टर के पास गईं। तब डॉक्टर उन्हें बताया कि वे एंजायटी की समस्या है और उन्हें मनोचिकित्सक के पास भेजा। जहां पता चला कि आठ साल पहले उनके दादा जी की मृत्यु हार्ट अटैक से हुई थी। जिसमें तब डॉक्टर ने बोला था कि अगर इनकी समय से जांच हो जाती तो वो बच जाते। यही बात उनके दिमाग में घर कर गई। लिहाजा, अब उन्हें डॉक्टर और जांच पर भरोसा नहीं हो रहा था। बाद में उनकी काउंसिलिंग की गई।

मेडिकल केस स्टडी- 02
बीमारी का ऐसा भ्रम हुआ कि 16 बार जांच करवा डाली
35 वर्ष के युवक को बार-बार मोशन के लिए जाना पड़ रहा था। इससे परेशान होकर उसने इंटरनेट पर सर्च इंजन गूगल में अपनी बीमारी का कारण तलाशना शुरू किया। जो जानकारी आई, उससे युवक को कोलन कैंसर का भ्रम होने लगा। इसके बाद वह फौरन गैस्ट्रो फिजिशियन के पास गया। जहां उसने 10 बार सोनोग्राफी, पांच बार एंडोस्कॉपी और एक बार सिटी स्कैन करवाया। जांच नॉर्मल आने पर भी उन्हें भरोसा ही नहीं होता था और बार-बार जांच करवाते रहे। बाद में डॉक्टर ने उन्हें मनोचिकित्सक के पास भेजने की सलाह दी। जहां काउंसिलिंग में पता चला कि घर में लंबे समय से विवाद चल रहा था। जिसकी वजह से वह डिप्रेशन में चले गए और कुछ भी सोचने लगे। बाद में एंटी डिप्रेशन का इलाज किया गया।

मेडिकल केस स्टडी- 03
सब-कुछ नॉर्मल होने के बावजूद 30 बार एचआईवी की जांच
प्रदेश के बड़े शहर के एक 23 वर्षीय युवक को स्पा सेंटर जाना भारी पड़ गया। हालांकि वहां उन्होंने किसी से संबंध नहीं बनाए लेकिन मन में शंका हो गई कि छूने से भी एचआईवी फैल जाता है। जिस पर वह इंटरनेट पर सर्च करने लगे। अब इंटरनेट के अथाह ज्ञान के भंडार में उसका दिमाग चकराने लगा। लिहाजा वह फिजिशियन और सेक्सोलॉजिस्ट के पास गए। और वह सालभर में 30 बार एचआईवी की अलग-अलग लैब से टेस्ट करवा लिए। लेकिन हर बार सब सामान्य आता रहा। बाद में मनोचिकित्सक के पास जाने की सलाह मिली। जहां उनकी काउंसलिंग होती है और एचआईवी को लेकर हर तरह की अनभिज्ञता को दूर किया जाता है।