
Arvind Gurjar chambal dakait story
Dakait Arvind Gurjar: 10 साल बिहड़ में रहकर मौत का इंतजार डराता था, 18 साल की जेल ने तड़पाकर रख दिया, घुट-घुट कर गुजरा एक-एक दिन...बागी अरविंद गुर्जर का कहना है 'मैं शुक्रगुजार उस IPS अफसर का जिसने मुझे आत्मसमर्पण करने को प्रेरित किया.. और उस एक फैसले ने मेरी जिंदगी बदल दी। मैंने जेल का एक-एक मुश्किल दिन इस इंतजार में गुजारा कि कल परिवार के साथ रहूंगा। और आज मैं अपने परिवार के साथ समाज की मुख्य धारा के बीच रह रहा हूं। मेरे घर की दीवार पर आज दो तस्वीरें हैं या फिर इंटरनेट पर नजर आने वाली मेरी फोटो.. जो गवाही देती हैं कि मैं कभी डकैत रहा हूं, लोग मेरे नाम से डरते थे... लेकिन तब मैं खुद भी पल-पल एक खौफ में जीता था पता नहीं कब किसका शिकार हो जाऊं, कैसे मेरी मौत आ जाए... आज परिवार है... मैं हूं और समाज के बीच पलने वाली सामाजिक खुशियां मेरी जिंदगी का हिस्सा हैं।'
पूर्व डकैत अरविंद गुर्जर (Dakait Arvind Gurjar) का अतीत काली स्याही है लेकिन आप कहानी पढेंगे और सुनेंगे... उस डकैत की जिसने एक IPS के कहने पर आत्मसमर्पण किया और नई जिंदगी की शुरुआत की। patrika.com संवाददाता संजना कुमार के साथ खुलकर की बात...जिंदादिली से बोले सरपंच का चुनाव लडूंगा और गर्व से कहा जीतूंगा भी...
अरविंद गुर्जर (Dakait Arvind Gurjar) का जीवन चंबल के उन सैकड़ों युवाओं जैसा है, जिन्हें सिस्टम की बेरुखी, पुलिसिया अविश्वास और सामाजिक बहिष्कार ने धीरे-धीरे अपराध की दुनिया में धकेल दिया। इंदौर में अक निजी कंपनी में नौकरी करने वाले अरविंद उस वक्त टूट गए जब उनके छोटे भाई नरेंद्र गुर्जर का अपहरण हुआ। निर्भय गुर्जर की गैंग उसे घर से उठाकर ले गई। पुलिस से गुहार लगाई तो किसी ने मदद नहीं की, FIR तक नहीं लिखी...गांव में भी उन्हें अपराधी मान लिया गया। जब उनके पिता ने जमीन बेचकर डेढ़ लाख रुपए की फिरौती नरेद्र को छुडवाने के लिए निर्भय गुर्जर को भेजे तो उसने फरमान जारी कर दिया कि गांव छोड़कर भाग जाओ वरना सभी को मार डालेंगे। गांव खाली करने की धमकी मिलते ही परिवार आनन-फानन में भिंड के एक छोटे से गांव में किराए के मकान में रहने को मजबूर हो गया। उनकी गांव में पड़ी जमीन बंजर हो गई। रोजी-रोटी का सहारा छिन गया।
इटावा (यूपी) के पैतृक गांव भरेह के अरविंद कहते हैं, "अभी तक मेरी पहचान भले दस्यु की रही है, लेकिन अब इसे बदलेंगे। बीहड़ और आतंक की बातें पुरानी हो चुकी हैं। अब समाज और लोगों को विकास की जरूरत है।"
उनकी तमन्ना गांव का सरपंच बनकर स्कूल, अस्पताल और मूलभूत विकास कार्यों के जरिए गांव की सूरत बदलने की है। 700 वोटों वाले भरेह गांव में सरपंच की सीट पिछड़ा वर्ग के कोटे में आती है। अरविंद का दावा है कि दस्यु जीवन में भले गांववाले उनसे कतराते थे, लेकिन अब उनके साथ हैं।
• निवास: भरेह, इटावा (यूपी), वर्तमान में ग्वालियर रहते हैं।
• दस्यु जीवन: 1996 से 2005 तक यूपी-एमपी के बीहड़ में गिरोह का संचालन।
• हथियार: एके-47, एके-56, 303 बोर की बंदूकें।
• अपराध: अपहरण, डकैती, लूट समेत 30 से ज्यादा अपराध दर्ज।
• गिरोह सदस्य: पत्नी शीला, भाई रामवीर सिंह गुर्जर, बवली, नीरज सिंह, सीपू तोमर, दीपू तोमर।
• इनाम: यूपी पुलिस की ओर से 1.50 लाख का इनाम। 20 साल पहले भिंड में किया सरेंडर।
अरविंद कहते हैं कि जब पुलिस से सहयोग नहीं मिला, समाज का साथ नहीं मिला तो अब प्राण कैसे बचते...रंजिश बढ़ी तो आक्रोश इतना हो गया कि घर-परिवार को बचाने के लिए वे मौसेरे भाई रज्जन गुर्जर की गैंग में शामिल हो गए। तीन साल वहां रहा, फिर अरविंद ने अपनी गैंग बना ली। हालांकि वे बताते हैं कि हर पल मौत सिर पर मंडराती रहती थी, पुलिस, मुखबिर या किसी के अपघात से जान तो जा ही सकती थी।
अरविंद बताते हैं कि उनके पिता दृष्टिबाधित थे। उन्होंने कई बार समझाया यह रास्ता गलत है। पुलिस आती है हम सबको परेशान करती है... लेकिन जब तक पिता रहे अरविंद उस दलदल से खुद को नहीं निकाल पाए। 2000 में पिता का निधन हो गया। इस खबर ने आहत कर दिया। अंतत: 17 फरवरी 2005 में भिंड पुलिस लाइन में तत्कालीन एसएसपी पंकज कुमार श्रीवास्तव के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और अपने बागी जीवन को अलविदा।
अरविंद कहते हैं कि उनकी गैंग के 20-25 लोग थे, जिनमें उनकी पत्नी भी शामिल थीं। इनमें से 8 ने समर्पण किया और बाकी वहीं लोकल के थे तो अपने-अपने घर लौट गए। उन्होंने बताया कि उन्होंने जो भी गुनाह किए उनके कर्मों की सजा मिली। लेकिन हत्या का एक भी मामला न होने के बावजूद कुछ झूठे आरोपों और पुराने मुकदमों ने उन्हें बागी बनाया, और फिर 18 की जेल काटने को मजबूर कर दिया। 18 साल तक एक-एक दिन बड़ी तड़प में गुजरा। ये जीवन बीहड़ के दिनों से भी क्रूर था। बीहड़ों में आजादी थी, यहां घुटन। इस घुटन से 17 साल 8 महीने यानी करीब 18 साल लड़ने वाले अरविंद कहते हैं कि शुरुआत में लगने लगा था आत्मसमर्पण कर गलत किया। लेकिन फिर दूजे ही पल परिवार और समाज के बीच सामान्य जीवन जीने की उम्मीद भी जागी। उसी उम्मीद 18 साल गुजर गए।
अरविंद गुर्जर कहते हैं कि फिलहाल खेती-किसानी करके खुश रहते हैं। गांव में उनकी पहचान अब डर नहीं बल्कि उनके व्यवहार और संवाद से हो रही है। उनकी पंचायत के लोग चाहते हैं कि वे सरपंच बनकर गांव का विकार करें, ग्रामीणों की समस्याओं को उठाएं और सरकारी सहयोग से उनका निराकरण करें। उनका कहना है कि वे बीहड़ों और जंगलों में थे, कभी निर्दोषों को नहीं सताया, अकेले निर्भय गुर्जर से उनकी व्यक्तिगत दुश्मनी थी। ऐसे में समाज उनके साथ है.. लोकतंत्र का दरवाजा खुला है... तो विकास और भरोसे से बनी एक पहचान को वो सरपंच बनकर डकैत का तमगा अपने नाम से हटाना चाहते हैं।
पूर्व डकैत अरविंद गुर्जर की ये कहानी सिर्फ एक डकैत या बागी की नहीं है बल्कि उन सवालों की है, जो पूछने को मजबूर कर रहे हैं... अगर समय पर न्याय, संवाद और सहारा मिल जाए, तो कोई भी भटकेगा नहीं... न अपराध होंगे और न ही डकैतों के इतिहास की कहानियां भविष्य में सुनाई देंगी।
Updated on:
27 Jan 2026 05:21 pm
Published on:
27 Jan 2026 05:17 pm
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