
ashutosh rana interview: फिल्म गुलाम में मेरा दमदार रोल देख महेश भट्ट ने दिया था दुश्मन में विलेन बनने का ऑफर
भोपाल। इच्छाओं और क्षमताओं में छोटा सा फर्क है। इच्छा शक्ति ही आपको जीत दिलाती है, लेकिन उसके लिए खुद की क्षमताओं को निखरना पड़ता है। जिंदगी जीने के दो ही तरीके हैं या तो क्षमताओं को इतना बड़ा कर लो कि इच्छा पूर कर सको, या इच्छा को क्षमता के अनुसार सीमित कर लो। तभी जिंदगी जी पाएंगे। मैंने कभी बड़े-बड़े सपने नहीं देखे। बस अपना काम करता गया। गुलाम फिल्म में मुझे बहुत छोटा सा रोल ऑफर हुआ था। मुझे अपनी क्षमताएं पता थी, लेकिन मैं इसलिए बैठा नहीं रहा कि जब तक दमदार रोल नहीं मिलेगा, तब तक काम नहीं करूंगा।
मैंने छोटे से रोल में जान डाल दी। महेश भट्ट ने वह सीन देखते ही मुझे ऑडिशन के लिए बुलाया और दुश्मन फिल्म में रोल ऑफर किया। दुश्मन का लज्जाशंकर पांडे वाला रोल मेरी पहचान बन गया। इसी रोल ने मुझे फिल्म फेयर में सर्वश्रेष्ठ खलनायक का पुरस्कार दिलाया। यह बात अभिनेता आशुतोष राणा (ashutosh rana interview) ने पत्रिका प्लस से विशेष बातचीत में कही। वे मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय(एमपीएसडी) के समापन सत्र में शामिल होने के लिए भोपाल आए थे।
औरंगजेब के किरदार के कारण नहीं मिला महाराजा छत्रसाल का रोल
आशुतोष(ashutosh rana interview) ने कहा कि मैं वेब सीरिज महाराज छत्रसाल में महाराजा छत्रसाल का रोल करना चाहता था। मैंने डायरेक्टर को लालच दिया, धमकाया, मान-मनौव्वल किया, लेकिन वे नहीं माने। उनका कहना था कि यदि तुम छत्रसाल का रोल करोगे तो औरंगजेब के लिए दमदार अभिनेता कहा से लाऊंगा। मैंने अपने करियर की शुरुआत रामलीला में अभिनय कर की थी। अपनी फिल्म करियर में चाणक्य, स्वामी विवेकानंद का रोल करना चाहता हूं।
कॉमनमैन विलन बन गया है
उन्होंने कहा कि आजकल किरदारों में बहुत बदलाव हो गया है, कॉमनमैन विलन बन गया है। विलन की परिभाषा बदल गई है। अमरत्व की तलाश के लिए प्रयासरत व्यक्ति जिसका काम रूपी वासना में रुचि ही नहीं है, उसके लिए लड़की और लकड़ी एक जैसी है लेकिन वो अमरत्व को पाना चाहता है ऐसा व्यक्ति भी विलन हो सकता है। इसके बाद हीरो का ट्रेंड भी बदल गया है, बेडमैन विथ गुड आर्ट। फिल्म वास्तव या ओमकारा में जो किरदार आए वो हीरो ग्रे शेड के थे।
मैं आज भी खुद को देहाती मानता हूं
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा मैं मुंबई में जरूर रहता हूं लेकिन आज भी खुद को देहाती ही मानता हूं। मैं रेणुका शाहणे का बहुत बड़ा फैन था। कभी सोचा भी नहीं था कि उनसे कभी शादी होगी। शादी के बाद फिल्मों से दूर रहने का फैसला उन्हीं का था। माता-पिता होने के नाते हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दे। यदि हम दोनों फिल्मों में बिजी हो जाते हैं तो हम अपने बच्चों को संस्कार रूप पेड़ से कैसे जोड़ पाते। मैंने उनके फैसला का हमेशा स्वागत किया। हाल ही में उन्होंने फिल्म रीटा का निर्देशन किया था। वे मराठी फिल्में और वेब सीरीज भी कर रही हैं।
पैर छुने की बजाए गुड मॉर्निंग कहा तो पिता चौंक गए
उन्होंने बचपन का एक किस्सा शेयर करते हुए कहा कि मैं कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ाई कर रहा था। एक दिन पिताजी मिलने आए तो मैंने पैर छुने की बजाए उन्हें गुड मॉर्निंग कहा। पिताजी चौंक गए। उन्होंने समझाया कि कभी अपने संस्कार मत छोडऩा। वह घटना मेरी जिंदगी के लिए सबक बन गई। मुझे साहित्य पढऩे का शौक था। उसी साहित्य ने मुझे शुद्ध हिन्दी पढऩे, सीखने और बोलने के लिए प्रेरित किया। मैं बड़े से बड़े फंक्शन में शुद्ध हिन्दी में ही बात करता हूं। इस पर मुझे गर्व भी है। अभी मैंने किताबों के लिए जितना भी कंटेंट लिखा है वह सब अपने मोबाइल में ही लिखा है। किसी भी प्रकार से कोई डायरी नहीं रखी है कि उसमें मैं लिखता रहूं। सब कुछ अब टेक्नोलॉजी की मदद से मैं मोबाइल पर ही मैंने अपनी किताब चित्त और वित्त और मौन मुस्कान की मार लिखी है। जल्द ही मौन मुस्कान की मार भाग-2 भी पढऩे को मिलेगी।
Updated on:
13 Jul 2019 01:02 pm
Published on:
13 Jul 2019 12:50 pm
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