
इस राज्य में Assistant Professors की भर्ती का ऐलान, अतिथि विद्वानों को नहीं निकाला जाएगा
भोपाल/ लंबे समय से अटकी अतिथि विद्वानों की नियुक्ति की मांग को अब हरी झंडी मिल गई है। बुधवार को उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने बुधवार को हुई अतिथि विद्वानों से मुलाकात के बाद उन्हें ये आश्वासन दिया। मंत्री पटवारी ने कहा कि, प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में रिक्त पड़े असिस्टेंट प्रोफेसरों के 1600 पद पर नियुक्ति की जाएगी। उन्होंने कहा कि, जब तक असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती नहीं होती इस पर अतिथि विद्वानों को नियुक्ति दी जाएगी। मंत्री पटवारी ने ये भी स्पष्ट किया कि, किसी भी अतिथि विद्वान को कॉलेज से निकाला नहीं जाएगा, सरकार सबके साथ है।
इरर के कारण नहीं खुल रही कॉलेज आवंटन की सूची
वहीं, पूर्व में स्वीकृत 680 पदों पर विभाग ने च्वाइस फिलिंग तो करा ली है, लेकिन बुधवार को जारी होने वालों का कॉलेज का आवंटन अब तक जारी नहीं हुआ है। विभाग ने अपनी वेबसाइट पर कॉलेज आवंटन की सूची तो अपलोड कर दी है, लेकिन इरर आने के कारण ये ओपन ही नहीं हो रहा है। हालांकि, उच्च शिक्षा विभाग ने बुधवार को अतिथि विद्वानों को तीन महीने का मानदेय भी जारी किया है। हालांकि, उनका ससवाल है कि, हमारी बकाया राशि तो आठ माह की है।
1600 पद और स्वीकृत करने का मिला आश्वासन
अतिथि विद्वान नियमितीकरण संघर्ष मोर्चा के प्रदेशाध्यक्ष डॉ देवराज सिंह ने बताया कि अतिथि विद्वानों के प्रतिनिधि मंडल ने मंत्री पटवारी से मुलाकात की है। उन्होंने 1600 पद और स्वीकृत करने का आश्वासन दिया है। लेकिन नौकरी से निकाले गए अतिथि विद्वानों को भी अब दोबारा नियुक्ति देने के लिए आदेश जारी कर देना चाहिए। वहीं, सभी अतिथि विद्वान को बीते आठ महीने से मानदेय नहीं मिला था, जिसके मिलने का वो इंतजार कर रहे थे। हालांकि, सरकार की ओर से मानदेय तो दिया नहीं बल्कि लोक सेवा आयोग से चयनित असिस्टेंट प्रोफेसरों के पदभार संभालने पर प्रदेश के करीब ढाई हजार असिस्टेंट प्रोफेसरों को नौकरी से जरूर निकाल दिया।
अतिथि विद्वानों के सवाल
डॉ देवराज का कहना है कि, इस लंबी लड़ाई के बाद फिलहाल विभाग ने मानदेय तो जारी कर दिया है, लेकिन ये आधा भी नहीं है। अतिथि विद्वानों को आठ महीने का बकाया मानदेय दिया जाना था, लेकिन बुधवार को सिर्फ तीन महीने का ही मानदेय दिया गया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि, सरकार को अतिथि विद्वानों के हाल पर तरस भी खाना चाहिए, क्योंकि आठ महीने से मानदेय न मिलने से सभी अतिथि विद्वान कर्ज में डूब चुके हैं। अब सरकार ने उन्हें आधे से भी कम यानी सिर्फ तीन माह का मानदेय दिया है, ऐसे में अब समझ नहीं आ रहा है कि महज तीन महीने के मानदेय से घर का राशन खरीदें, बच्चों की स्कूल फीस दें या माता-पिता की दवाओं पर खर्च करें, क्योंकि फिलहाल तो नौकरी का भी सहारा नहीं है।
Published on:
06 Feb 2020 01:23 pm

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