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गैस राहत हॉस्पिटल की कैंटीन के ठेकेदार पर अधिकारियों की मेहरबानी!

इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल में कैन्टीन चलाने वाले ठेकेदार पर अधिकारी पूरी तरह से मेहरबान हैं।

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Juhi Mishra

Nov 02, 2015

भोपाल।
इंदिरा गांधी गैस राहत अस्पताल में कैन्टीन चलाने वाले ठेकेदार पर अधिकारी पूरी तरह से मेहरबान हैं। हालात एेसे हैं कि ठेकेदार यहां भर्ती होने वाली प्रसूताओं को गुणवत्ताहीन और सस्ता खाना खिला रहा है। लेकिन, जिम्मेदार कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे हुए हैं। ठेकेदार और अधिकारियों की मिलीभगत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले छह साल से कैन्टीन का ठेका एक ही ठेकेदार को मिल रहा है।


पत्रिका एक्सपोज की टीम खाने की गुणवत्ता देखने इंदिरा गांधी अस्पताल पहुंची तो यहां के कर्मचारियों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि नियमानुसार ठेकेदार को खाना कैन्टीन में ही बनाना चाहिए, लेकिन ऐसा न करके। ठेकेदार घर से ही खाना बनवाकर तीन डिब्बों में मंगवाता है। ठेकेदार के कर्मचारी इसी खाने को प्रसूताओं को सर्व कर देते हैं। ठेकेदार की इस लापरवाही को जिम्मेदार नजरअंदाज कर रहे हैं। कार्रवाई करने की जगह उसे उल्टा संरक्षण दिया जा रहा है। इसके पीछे कमीशनखोरी को वजह बताया जाता है।


कार्रवाई नहीं उल्टा संरक्षण

प्र सूताओं को पौष्टिक खाना प्रदाय किया जाए इसे ध्यान में रखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने प्रतिदिन के हिसाब से चाय-नाश्ता से लेकर खाने तक का मीनू तय किया हुआ है। खाने की आपूर्ति करने के लिए हर वर्ष निविदा जारी कर ठेका दिया जाता है। इंदिरा गांधी अस्पताल में जिस ठेकेदार को खाने की आपूर्ति का काम दिया गया है वह प्रसूताओं को लगातार सस्ती और एक ही सब्जी रिपीट की जाती है। खाने से चावल गायब है और सलाद का भी कोई अता पता नहीं रहता है।


परेशान रहते हैं मरीज

अस्पताल में भर्ती प्रसूताओं और उनके परिजनों से चर्चा करने पर पता चला कि यहां के खाने की गुणवत्ता खराब होने के कारण अधिकांश प्रसूताएं यहां का खाना खाती ही नहीं हैं। शहर की प्रसूताओं के परिजन अपने घरों से खाना लेकर आते हैं। लेकिन जो शहर के बाहर से आती हैं उन्हें यहीं खाना लेना पड़ता है। एेसे खाने से किस का विकास होगा इस पर जिम्मेदारों का ध्यान नहीं है।


दिखावे की टेंडर प्रक्रिया

सूत्रों की मानें तो कैन्टीन का ठेका अस्पताल प्रबंधन अपने चहेते को देता है। हालात एेसे हैं कि करीब छह साल पहले जिस व्यक्ति ने यही ठेका ढाई लाख रुपए में लिया था। उसी व्यक्ति को इस बार ठेका महज 60 हजार रुपए में दिया गया है। जबकि, इन पांच-छह सालों में मरीजों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। एेसे में ठेके की राशि में इजाफा होना चाहिए था, लेकिन एेसा नहीं हुआ। इसके पीछे अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत बताई जाती है। आरोप है कि ठेकेदार दूसरे लोगों को निविदा भरने नहीं देता है। अगर कोई भरता है तो उसमें कमी बता निकालकर रिजेक्ट कर दिया जाता है।


ऐसा खाना बांटा जाता है, घरेलू सिलेंडर का उपयोग

अधिकारियों का संरक्षण प्राप्त ठेकेदार के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह प्रसूताओं को लगातार घटिया खाना दे रहा है। इस पर किसी का ध्यान नहीं है। यहीं नहीं, कैंटीन में घरेलू गैस सिलेंडर का उपयोग किया जा रहा है। खुलेआम हो रही नियमों की अनदेखी अधिकारियों को नजर नहीं आना भी सवाल खड़े करता है।

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