
भोपाल गैस कांड की कुछ चुनी हुईं कहानियों में एक और सच्ची कहानी आपके सामने है.. गैस कांड की सुबह भोपाल की तस्वीर ही बदल चुकी थी.. उस रात गैस प्रभावित इलाकों में मौत का कहर सबने देख लिया था.. लेकिन अब बारी थी उस दर्द के समंदर की, जिसकी गहराइयों में लाखों परिवारों की खुशियां दफन होने वालीं थीं.. उस सुबह शायद आधा भोपाल ही नहीं जानता था कि उन्होंने अपने कितने करीबियों को हमेशा के लिए खो दिया है..
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ऋषि रमण उपाध्याय@भोपाल। 'तुम तो कह रहे थे सिलेण्डर लीक हुआ है, ये सब..ये सब क्या है, जवाब मिला -अरे मुझे क्या पता यार..तुम जल्दी चलो बस'। वाकई बहुत अजीब माहौल था। श्रीनिवास की समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या समझने की कोशिश करे। ये तो नर्क है..हर तरफ लाशें हैं, लोग बेसुध पड़े हैं, जो चल पा रहे हैं वो चल रहे हैं..जो नहीं चल पा रहे हैं, वो बैठे हैं या लेटे हैं..जो बैठे हैं वो बस जैसे मरने ही वाले हैं..और जो लेटे हैं, वो मर चुके हैं।
3 दिसम्बर 1984 की सुबह श्रीनिवास मिश्रा के लिए सर्दियों की एक आम सुबह थी। पी. डब्ल्यू. डी में काम करने वाले श्रीनिवास हर रोज की तरह अरेरा कॉलोनी में अपने मामा के घर से काम पर जाने की तैयारी कर रहे थे। ये भोपाल का वो हिस्सा था, जहां सब कुछ शान्त था..घरों में हर दिन जैसा माहौल था.. बस कुछ घऱों से लोग तेजी से निकलकर कहीं जा रहे थे।
'देर हो गई तो आज फिर पूरा दिन खराब हो जाएगा..' कमीज पर किसी चीज का दाग था, जो साफ नहीं हो रहा था। 'मामी! प्रेस कहां रखी है' पिछले दिन की कमीज निकलते हुए उसने पूछा। मामी का जवाब आता उससे पहले ही किसी ने दरवाजा तोड़ने जैसी हालत में दस्तक दी। ऑफिस के लिए हो रही देरी की परेशानी और भड़भड़ाहट की हैरानी के मिले जुले भाव में श्रीनिवास ने दरवाजा खोला। शरद उसे धक्का देकर अंदर घुसा।
'तेरा दिमाग तो ठीक है..पागल हो क्या है क्या..ये क्या तरीका है..बोल कुछ..अरे जल्दी बता न..क्या हुआ।' इससे पहले कि पसीने से लथपथ शरद कुछ बोल पाता, श्रीनिवास ने उस पर सवालों की झड़ी लगा दी। 'किसी का फोन आया था..तुम्हारे मामा..सिलेन्डर फट गया..पता नहीं..वो सब बेहोश..तुम जल्दी चलो।' जहांगीराबाद तक दोनों के मन में बहुत सारे सवाल आ जा रहे थे। अब सब कुछ सामने था।
रेलवे में सीनियर आईओडब्लयू के.के. तिवारी 2 दिसम्बर की शाम ऑफिस से थक हारकर लौटे थे। टीटी गेस्ट हाउस के पास अपनी पत्नी और 4 बच्चों के साथ खाना खाकर सोने के बाद जब देर रात उनकी आंखें खुलीं तो परिवार को खांसते हुए पाया। घर के सभी लोग बात करने की स्थिति में नहीं थे, केके तिवारी ने उठने की भरसक कोशिश की। बुझती आंखों से अपने परिवार को देखा, और खड़े होने के लिए पलंग का सहारा लिया ही था कि मुंह से गाढ़ा सा झाग निकला और वो बेहोश हो गए। आंखें खुलीं तो श्रीनिवास उनके सामने था।
अरेरा कॉलोनी के देवानी अस्पताल के बाहर खड़े अपने रिश्तेदारों की तरफ श्रीनिवास ने नजर डाली और टूटकर पास ही रखे पत्थर पर बैठ गया। सारी बातें लगातार आंखों के सामने घूम रहीं थीं। श्रीनिवास ने महसूस किया कि उसके हाथ कांप रहे थे और पास खड़े लोग लगातार सवाल पूछ रहे थे। कान सुन्न हो चुके थे और वो सारे सवाल गूंजती हुई सी आवाज में सुनाई दे रहे थे।
श्रीनिवास जब अपने मामा के घर पहुंचे तो उन्हें बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। सांसें सबकी चल रहीं थीं, लेकिन कोई भी ऐसा नहीं था जो अपने पैरों पर उठकर अस्पताल तक पहुंच पाए। श्रीनिवास ने एक एक कर सबको अस्पताल पहुंचाना शुरू किया। हालत सबकी खराब थी, लेकिन 13 साल की गुड़िया लाख कोशिशों के बाद भी कोई हरकत नहीं दिखा रही थी। छाती पर कान लगाया तो धड़कन ने धीमी से अपनी मौजूदगी का एहसास करा दिया।
फौरन एक एक कर सबको गाड़ी में बैठाना शुरू किया। शरद और श्रीनिवास चुप थे, उनकी मदद करने के लिए कोई नहीं था वहां। जो आस पास थे..उन्हें खुद ही मदद की जरूरत थी। गुड़िया को गाड़ी में लिटाकर वापस आए श्रीनिवास ने मामा को सहारा देकर बाहर लाने की कोशिश की। केके तिवारी बेहोश थे और बस सांसों से अपने जिंदा होने का एहसास करा रहे थे। श्रीनिवास के हाथों को जैसे झटका लगा। जोर का दबाव महसूस करने के बाद उसने बस इतना ही सुना - 'श्रीनिवास..तुम..तुम मुझे..बचा लो..देखना मैं..मैं सब को..बचा लूंगा..सबको बचा लूंगा..मैं..' रास्ते भर श्रीनिवास अपने मामा को यही कहते आए कि बस अब कुछ नहीं होगा। सब ठीक हो जाएगा।
गाड़ी में बैठाने के बाद से अस्पताल के रास्ते भर श्रीनिवास की बातों को सुनने के बाद केके तिवारी की हिम्मत थोड़ी बढ़ गई थी। इसीलिए उन्हें उस दिन मौत नहीं आई। वो बात अलग है कि श्रीनिवास की हिम्मत, डॉक्टरों की कोशिश और सभी की दुआएं भी केके तिवारी के लिए बस एक दिन की जिंदगी ही बढ़ा पाईं। 4 दिसम्बर को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। मौत के लिए उस परिवार का सबसे आसान शिकार तो 13 साल की गुड़िया थी, जो बेचारी मिथाइल आइसोसायनाइड की जहरीली सांसों से खुद को अलग नहीं कर पाई।
पत्थर पर बैठे श्रीनिवास को अब कुछ कुछ सुनाई देने लगा था। उसे उलझन हो रही थी, वो किसी पर चिल्लाना चाहता था, वो रोना चाहता था, वो किसी को दोष देना चाहता था। लेकिन उसे उलझन क्यों हो रही थी..वो किस पर चिल्लाता..रोते हुए लोगों में वो किस का कंधा पकड़े ये सोचते हुए वो किसी को दोष भी नहीं दे पा रहा था। वो बस वहां से पीठ करके चला गया..आगे बहुत आगे..सोचते हुए कि क्या कुछ और किया जा सकता था। कानों में बस वो एक लड़खड़ाती सी आवाज गूंज रही थी..तुम मुझे बचा लो..मैं सबको बचा लूंगा..
Published on:
02 Dec 2017 04:30 pm
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