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BHOPAL की तंग गलियों से निकली ‘लिपस्टिक अंडर माई बुर्का’ की कहानी, देखें Review

मध्यप्रदेश के भोपाल की तंग गलियों में फिल्माई गई 'लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का' पुराने ख्यालात से उठकर नए ख्यालात में जीने की चाह रखने वाली महिलाओं के ईर्द-गिर्द घूमती है।

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Manish Geete

Jul 22, 2017


भोपाल। मध्यप्रदेश के भोपाल की तंग गलियों में फिल्माई गई 'लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का' पुराने ख्यालात से उठकर नए ख्यालात में जीने की चाह रखने वाली महिलाओं के ईर्द-गिर्द घूमती है। बुर्के में कैद यहां की महिलाएं कैसे बंदिशों को तोड़ खुले में जीने की कोशिश करती हैं। प्रकाश झा निर्मित यह फिल्म कई बार विवादों में आई। यहां तक कि प्रकाश झा के भोपाल में घुसने नहीं देने तक का फतवा जारी कर दिया गया था। इसके अलावा सेंसर बोर्ड की कैंच के कारण भी यह विवादों में रही।

आखिर क्या है इस फिल्म में
लिपस्टिक अंडर माई बुर्का एक छोटे से शहर में रहनेवाली चार महिलाओं की कहानी है, जो अलग-अलग उम्र की महिलाओं पर आधारित है। सभी महिलाएं अपने ख़्वाब को हक़ीक़त में बदलना चाहती है। चाहे बात इश्क की हो या जिस्म की। यह उसी समाज की महिलाएं जहां मर्द तय करते हैं कि इन महिलाओं को कब क्या करना है, कब खाना पकाना है कब खाना है और कब हम बिस्तर होना है।

फिल्म देखने से पहले पढ़ें ये आठ कारण
-लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का फिल्म समाज के उन लोगों पर सवाल खड़ा करती है जो महिलाओं को हमेशा पीछे रखने की सोच रखते हैं।

-भोपाल में शूट हुी है यह फिल्म, पुराने भोपाल की संस्कृति को बताती है।

-यह उन लोगों की तरफ भी इशारा करती है जो हमेशा नैतिकता का चोला पहले होते हैं लेकिन कभी खुद नैतिक नहीं होते।

-पुराने भोपाल में रहने वाली चार अलग-अलग उम्र की महिलाओं की संघर्ष की कहानी है जो समानांतर चलती है। वे अलग-अलग होती हैं लेकिन एक सूत्र में बंध जाती है।

-इस फिल्म की सेक्सुअल टोन को कुछ लोग पसंद नहीं कर रहे हैं, लेकिन कुछ इसे लिपिस्टिक क्रांति मानते हैं। सेंसर बोर्ड ने भी इस पर आपत्ति की थी।

-इच्छा के खिलाफ घर में कैद और नैतिकता की आड़ में रहने वाली महिलाओं को लेकर कुछ सवाल आपके मन में भी उठते हैं तो यह फिल्म उसे कुछ सोचने को मजबूर कर देंगी।

-कुछ महिलाओं की निजी जिंदगी में भी झांकती है यह फिल्म, उनके दिमाग में क्या चल रहा है वो बातें पर्दे पर देख आप चौंक जाएंगे कभी आपको ये बातें झकझोर देंगी।

-महिलाओं के लिए यह सबसे बड़ा शब्त होता है कि लोग क्या कहेगे। आप फिल्म में यह महसूस करेंगे कि पुरुष किरदारों को एक जैसे नजरिए से दिखाया गया है। जैसे कहा जाए कि सब मर्द एक जैसे होते हैं।

लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का
डायरेक्टर अलंकृता श्रीवास्तव
रिहाना ( पलाबिता बोरठाकुर) बुर्के में कैद
लीला (आहाना कुमरा) एक ब्यूटी पार्लर चलती है
बुआ जी (रत्ना पाठक शाह ) जो की विधवा हैं
शीरीन ( कोंकणा सेन) सेल्स गर्ल हैं

यह भी हैं
एक्‍टर विक्रांत मैसी, सुशांत सिंह
संगीत- जेबुनिस्सा बंगेश और मंगेश धाकड़े
सिनेमेटोग्राफर- अक्षय सिंह।

lipstick under my burkha

यह है कमियां
-फिल्‍म में नए पन की कमी लगती है। पार्च्ट फिल्म से मिलती जुलती है।
-मध्‍यम वर्ग या नीचले माध्यम वर्ग की कहानी कहती है, यदि उच्च वर्ग की भी बात होती तो शायद रेंज और बढ़ जाती।
-बड़े और अच्छे ऐक्टर मिलते तो जान आ जाती है।


यह है खूबियां
-इसका स्क्रीन प्ले काफी खूबसूरती से लिखा गया।
-इस फिल्‍म के किरदार जिन्हें शानदार तरीके से गढ़ा गया।
-इसके किरदार आपको महसूस नहीं होने देंगे कि इस तरह की कहानी पहले भी देख चुके हैं।
-दमदार अभिनय किया है रत्ना, कोंकणा, आहाना और पलाबिता ने।


कई बार विवादों में रही फिल्म
-सेंसर बोर्ड ने सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था।
-भोपाल के मुस्लिम त्योहार कमेटी की मजलिसे शूरा ने फिल्म का बॉयकॉट करने का फतवा जारी किया था।
-भोपाल के संगठनों ने प्रकाश झा को भोपाल में ही नहीं घुसने देने का फतवा जारी किया था।
-फिल्म के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने की भी चेतावनी दी थी।