
़धूल-कीचड़ से धुलेंडी, रंग से खेली जाती थी पंचमी, छह दशकों से निकल रहा चल समारोह
भोपाल. रंगपंचमी का चल समारोह शनिवार को 11 बजे से शुरू होगा। वर्तमान में भले ही होली और रंगपंचमी दोनों दिनों में रंग और गुलाल उडऩे लगें हो लेकिन पहले से ऐसा नहीं था। दशकों पहले रंग केवल रंगपंचमी पर ही खेला जाता था, जबकि होली पूरी तरह लोक मस्ती का त्यौहार था, जिस पर धूल-मिट्टी और कीचड़ में खेलने की पंरपरा थी। बाद में समय बदला तो लोग धूल-कीचड़ की होली से दूर होते गए। चल समारोह का इतिहास भी छह दशक से अधिक पुराना है। पत्रिका ने शहर के बुजुर्गों से रंगपंचमी और चल समारोह का इतिहास जानने की कोशिश की।
1929 से शुरू हुआ सार्वजनिक होलिका दहन
शहर में दशहरा उत्सव के चल समारोह के बाद होली दहन का सार्वजनिक आयोजन 1929-30 में चौक के गुलिया दाई मोहल्ले से शुरू हुआ था। दूसरे ही साल चौक में दो स्थानों पर ओर होलिका दहन शुरू हो गया। नवाब रियासत ने की शुरुआत मुस्लिम रियासत में नवाब भोपाल ने सामाजिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब के रूप में शुरू किया था। देश के आजाद होने के दो साल बाद भोपाल का देश में विलिनीकरण हुआ था। इसके बाद इसे सी ग्रेड की स्टेट का दर्जा भी मिला। मध्यप्रदेश राज्य बनने के दौरान भोपाल तहसील था और सीहोर जिला था। हिंदू मुस्लिम एकता और धार्मिक आयोजन को सौहाïर्द का त्यौहार बनाया।
दूसरे दिन भी मनती थी सीहोर में होली
तब सीहोर भी नबाव रियासत का हिस्सा था। नवाब हमीदुल्ला खान शहर में होली खेलते तो होली के दूसरे दिन सबसे मिलने व रंग खेलने सीहोर जाते थे। इस पर पंरपरा बन गई और आज भी सीहोर में होली दो दिन की होती है।
विवाद टालने धुलेंडी पर शुरू हुई रंगों से होली
तीन-चार दशक पहले तक होली पर जमकर धमाल हुआ करता था। होली पर रंगों के बजाए धूल-मिट्टी और कीचड़ से खेली जाती थी जिसे धुलेंडी नाम से जाना जाता था। वरिष्ठ समाजसेवी पंडि़त ओम मेहता बताते है कि उनके पिता हिंद महासभा के शहर प्रमुख पंडित उद्धवदास मेहता, पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के पिता पं.खुशीलाल वैध, शहर के पहले विधायक बाबूलाल भारती व अन्य जिम्मेदार नागरिकों ने धूल व कीचड़ से होली में विवाद होने की स्थिति में धुलेंडी उर्फ होली को सह्दयता व भाईचारे से खेलने के लिए लोगों को समझाया ही नहीं बल्कि दीवारों पर रंगों से ही होली खेलने के स्लोगन लिख-लिख कर जागरुक किया।
Published on:
14 Mar 2020 01:26 am
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