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मिनटों में आपके ‘दांतों की बीमारी’ बता देगा ये हेलमेट, नहीं कराना पड़ेगा एक्स-रे

Health news: यह प्रोजेक्ट इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के फर्स्ट इन वर्ल्ड चैलेंज के तहत चुना गया है।

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dental ailments

dental ailments (Photo Source - Patrika)

Health news: अगर आप दांतों में किसी भी प्रकार की समस्या से परेशान है तो ये खबर आपके काम की है। जानकारी के लिए बता दें कि अब दांत और जबड़े की जांच के लिए एक्स-रे या जटिल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होगी। मरीज को अलग-अलग जांच से भी नहीं गुजरना पड़ेगा। इसके लिए एम्स में हेलमेट के आकार की एक डिवाइस विकसित की जा रही है। जिसे पहनते ही कुछ ही मिनटों में पूरी 3-डी जांच संभव होगी। मरीज के इस डिवाइस को ही दांत और जबड़े की 3-डी इमेज , तैयार हो जाएगी। पूरी प्रक्रिया तेज और आसान होगी।

एआइ से मिलेगी सटीक रिपोर्ट

इस विशेष यंत्र में कृत्रिम बुद्धिमता (एआइ) का उपयोग किया जा रहा है। आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क तकनीक से इमेज का विश्लेषण होगा। इससे बीमारी की पहचान ज्यादा सटीक हो सकेगी। रिपोर्ट पारंपरिक एक्स-रे से अधिक स्पष्ट और विस्तृत होगी। यह प्रोजेक्ट इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के फर्स्ट इन वर्ल्ड चैलेंज के तहत चुना गया है। इससे इसकी अहमियत और अनोखेपन का अंदाजा लगाया जा सकता है। तकनीक सफल होने पर भारत को वैश्विक पहचान मिल सकती है

दांतों के इलाज में आएगा बड़ा बदलाव

यह तकनीक डेंटल और मैक्सिलोफेशियल जांच में नई दिशा देगी। डॉक्टरों को बेहतर और तेज निर्णय लेने में मदद मिलेगी। इस अनोखा आविष्कार सफल हुआ तो दांतों की जांच का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। मरीजों को तेज, सटीक और बेहतर इलाज का नया विकल्प मिलेगा। समय की बचत होगी और जांच प्रक्रिया सरल बनेगी।

भोपाल एम्स लाएगा क्रांतिकारी परिवर्तन

स्वास्थ्य सेवाओं के तेजी से बदलते स्वरूप के बीच भोपाल में विभिन्न रोगों के परंपरिक इलाज से दो कदम आगे एक ही रोग के प्रत्येक रोगी का अलग उपचार शुरू किया जाएगा। इसके तहत हर रोगी की शारीरिक स्थिति, उसके जीन (डीन), जीवनशैली, पर्यावरण और बीमारी के प्रकार के आधार उपाचर किया जाता है। इस आधुनिक चिकित्सा पद्धति को प्रिसिजन मेडिसिन कहा जाता है। इसके तहत कैंसर, हृदय रोगों, डायबिटीज और मनोरोग को जड़ से खत्म किया जा सकता है। एम्स भोपाल में एक वर्ष से ट्रॉयल चल रहा है। जीन आधारित जांच व उन्नत डायग्नॉस्टिक तकनीकों को धीरे-धीरे शामिल किया जा रहा है।

ऐसे होता है उपचार

मान लिया जाए कि दो मरीजों को कैंसर है, लेकिन दोनों के जीन अलग हैं। इसलिए एक ही दवा दोनों पर समान असर नहीं करती। प्रिसिजन मेडिसिन में जीनकी जांच के आधार पर हर मरीज के लिए अलग और सही दवा का चुनाव किया जाता है।