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अपनी तहजीब, रहन-सहन पर बिरजीस को इतना घमंड कि शहर का कोई भी आदमी उसे अपनी बेटियों के काबिल नहीं लगता

शहीद भवन में 17वें स्मरण हबीब राष्ट्रीय रंग आलाप नाट्य महोत्सव, पहले दिन नाटक 'बिरजीस कदर का कुनबा' का मंचन
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अपनी तहजीब, रहन-सहन पर बिरजीस को इतना घमंड कि शहर का कोई भी आदमी उसे अपनी बेटियों के काबिल नहीं लगता

भोपाल। शहीद भवन में शुक्रवार को 17वें स्मरण हबीब राष्ट्रीय रंग आलाप नाट्य महोत्सव की शुरुआत हुई। पहले दिन हम थिएटर समूह की ओर से उर्दू नाटक 'बिरजीस कदर का कुनबा' की प्रस्तुति दी गई। नाटक का निर्देशन बालेंद्र सिंह 'बालू' ने किया है। नाटक को स्पेनिश राइटर फेडेरिको गार्सिया लार्को ने लिखा है और हिंदी अनुवाद रघुवीर सहाय ने किया है।

इस नाटक के संगीत में मॉरिस लॉजरस ने दर्शकों को एक नए प्रयोग से रूबरू कराया। नाटक की कहानी एक महिला पर आधारित है, जो अपने पढ़े-लिखे, तहजीब, साफ सफाई, रहन-सहन पर काफी घमंड करती है। वह जिस शहर में रहती है, वहां के आदमियों को अपनी बेटी के लायक नहीं समझती है। नाटक की कुल अवधि 1 घंटे 30 मिनट की रही।

खुद को बेटियों संग घर की चारदीवारी में बंद रखती है बिरजीस
नाटक की शुरुआत बिरजीस के पति की मृत्यु से होती है। बिरजीस की पांच बेटियां हैं, जिसमें फहमीदा 39, कुदसिया 35, आमिला 25, मुश्तरी 24 और आदिला 20 साल की होती है। बेटियों की इतनी उम्र हो गई है, लेकिन बिरजीस को इनकी शादी का बिल्कुल ख्याल नहीं रहता है। बिरजीस अपनी बेटियों को अपने तरीके से रखना चाहती है। वह खुद को और बेटियों को घर की चारदीवारी में बंद रखती है और उन्हें नीरस जीवन जीने के लिए मजबूर करती है।

नाटक में आगे 25 साल का अतहर बड़ी बेटी फहमीदा से शादी करना चाहता है, जबकि वह प्यार आदिला से करता है। वह शादी सिर्फ पैसों के लिए करना चाहता है। मुश्तरी भी अतहर से प्यार करती है और वह चाहती है कि अतहर मेरा नहीं तो किसी का नहीं होने दूंगी। बिरजीस के साथ बेटियों की बगावत हो जाती है। अंत में मुश्तरी, आदिला को झूठी खबर देती है कि अतहर को हमने बंदूक से उड़ा दिया। यह सुन आदिला फांसी लगा लेती है।

कमजोर लगा नाट्य रूपांतरण, सींस में किया बदलाव

बालेन्द्र ने बताया कि इस नाटक को पढ़ते वक्त मुझे इसका नाट्य रूपांतरण कुछ कमजोर सा लगा। मैंने स्पैनिश प्ले के इंग्लिश ट्रांसलेशन को पढ़ा और फिर कुछ चीजों को जोड़ा और कुछ दृश्य हटाए। तब कहानी का असली मर्म सामने आ सका। मेरी गुरू विभा मिश्रा जी ने भी इस नाटक को किया है लेकिन तब मैं देख नहीं पाया था। इसके अलावा दिसम्बर 2016 में केजी त्रिवेदी जी के निर्देशन में भी इस नाटक का मंचन हो चुका है और मैं वो शो भी नहीं देख पाया था। 28 अप्रेल का इसका पहला शो शहीद भवन में ही किया।

18 साल पहले देखा था नाटक

बालेन्द्र ने बताया कि 18 साल पहले मैंने एनएसडी में यह प्ले देखा था, स्क्रिप्ट और कलाकारों के अभिनय ने इतना प्रभावित किया कि मैंने तय कि कभी इस नाटक को निर्देशित करूंगा। पिछले 2 सालों से यह स्क्रिप्ट ज्यादा कुलबुलाने लगी तो मैंने कलाकारों से मिलना शुरू किया। कुछ लोगों को तलाशा और कुछ हमारे गु्रप में भी थीं। पहले महीने हमने रीडिंग, कास्टिंग और उर्दू जबान पर काम किया। बिरजिस के रोल के लिए मेरे जेहन में रीटा वर्मा और सरोज शर्मा ही थीं। मैं सबसे पहले रीटा जी के पास गया उन्होंने इसके लिए हां कर दी। वैसे इन दोनों के अलावा कोई और भोपाल में नजर नहीं आया।