
भोपाल। देश के वरिष्ठ हिंदी कवि, लेखक और पत्रकार माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म 4 अप्रैल 1889 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम नन्दलाल चतुर्वेदी था जो गाँव के प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। उनके जन्मदिवस के मौके माधवराव सप्रे संग्रहालय के संस्थापक व वरिष्ठ पत्रकार विजय दत्त श्रीधर ने पत्रिका प्लस के साथ उनसे जुड़े कुछ किस्से शेयर किए जो उन्होंने अपने वरिष्ठ साथियों और तत्कालीन खंडवा जिले के अधिकारी संतोष कुमार शुक्ल से सुने थे। श्रीधर बताते हैं कि माखनलाल चतुर्वेदी से मिलने के लिए एक बार नागपुर से पत्रकारों का दल खंडवा गया था। उस वक्त उन्होंने कहा था कि देखो भाई, तुम्हारी कीमत लगेगी, बार-बार लगेगी लेकिन जिस दिन तुमने अपनी कीमत ले ली उस दिन तुम्हारी कोई कीमत नहीं रह जाएगी। श्रीधर के मुताबिक इस बात से मौजूदा दौर में सीख लेने की जरूरत है। वर्ष 1990 में भोपाल में पत्रकारिता विश्वविद्यालय भी उन्हीं के नाम पर स्थापित किया गया है।
गांधी जी ने दी थी 24 घंटे निर्जल रहने की सजा
वर्ष 1920 के एक वाकये का जिक्र करते हुए श्रीधर बताते हैं कि महात्मा गांधी क्रांतिकारियों का समर्थन नहीं करते थे और चाहते भी नहीं थे कि उनके सहयोगी भी ऐसा कुछ करें। जबकि माखनलाल क्रांतिकारियों के वक्तव्य छापने के साथ-साथ उनकी मदद भी करते थे। एक बार जबलपुर में एक क्रांतिकारी छिपे हुए थे, कर्मवीर के संपादक के तौर पर माखनलाल ने ही उन्हें शरण दी। जब पता लगा कि पुलिस उस क्रांतिकारी को कभी भी गिरफ्तार कर सकती है तब माखनलाल खुद जाकर उन्हें नागपुर तक छोड़ा जहां से वो दक्षिण भारत चले गए। इसके बाद माखनलाल को लगा कि यह गलत है तो वेे सेवाग्राम गए, और गांधी जी को बताया कि मैंने एक क्रांतिकारी की मदद की है। तब गांधी जी ने उन्हें प्रायश्चित के तौर पर एक दिन का निर्जला व्रत रखने को कहा। इसके बाद 24 घंटे तक भूखे-प्यासे रहे माखनलाल को गांधी जी ने खुद खाना परोसकर खिलाया। इस प्रकार माखनलाल ने क्रांतिकारी के प्रति कर्तव्य की पूर्ति भी की और प्रायश्चित भी किया।
हिन्दी के लिए 1967 में लौटा दिया था 'पद्मभूषण'
माखनलाल चतुर्वेदी कविता के मामले में मैथिलीशरण गुप्त को अपना गुरु मानते थे और वर्ष 1916 में उनसे पहली मुलाकात लखनऊ कांग्रेस में हुई। जिसके बाद मैथिलीशरण गुप्त ने उनके जन्मदिन पर 'माखन सा मन मृदुल तुम्हारा मिश्री जैसे वचन रसाल...Ó कविता भी लिखकर भेजी थी। वर्ष 196& में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' से अलंकृत किया लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी पर आघात करने वाले राजभाषा संविधान संशोधन विधेयक के विरोध में 10 सितंबर 1967 को माखनलाल चतुर्वेदी ने यह अलंकरण लौटा दिया था।
द्वारकाप्रसाद मिश्र ने कहा था आज सत्ता, साहित्य के श्रीचरणों में नत है
श्रीधर बताते हैं कि 16-17 जनवरी 1965 को मध्यप्रदेश शासन की ओर से खंडवा में 'एक भारतीय आत्मा' माखनलाल चतुर्वेदी के नागरिक सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। तत्कालीन राÓयपाल श्रीहरि विनायक पाटसकर और मुख्यमंत्री पंडित द्वारकाप्रसाद मिश्र खुद उनके घर पहुंचे थे और मिश्र ने नतमस्तक होते हुए पहला वाक्य कहा था कि आज सत्ता, साहित्य के श्रीचरणों में नत है।
- वर्ष 1954 में साहित्य अकादमी पुरस्कारों की स्थापना होने पर हिन्दी साहित्य के लिए प्रथम पुरस्कार भी 'हिमतरंगिनी' के लिए दिया गया
-वर्ष 194& में हिन्दी साहित्य का सबसे बड़ा 'देव पुरस्कार' 'हिम किरीटिनी' पर मिला।
-सागर विवि ने वर्ष 1959 में घर जाकर डी.लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया
Published on:
04 Apr 2018 12:17 pm
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