
javed akhtar
भोपाल। स्पोर्ट्स एंड कल्चर प्रमोशन ग्रुप की ओर से गुरुवार को समन्वय भवन में 'लोकतंत्र का पर्व और जावेद अख्तर' नाम से एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का समय 6.30 बजे का था, लोग 6 बजे से ही आना शुरू हो गए। आयोजकों को लगा कि भीड़ बढ़ सकती है तो पहले 6.20 तक आने वाले लोगों को बालकनी में बैठने के लिए कहने लगे, कारण बताया कि नीचे का हॉल हाउसफुल हो चुका है। 6.45 बजे जब आयोजकों को लगा कि नीचे तो 50-60 लोग ही हैं तो मंच से अनाउंस किया और ऊपर बालकनी में बैठे लोगों को भी नीचे आने का आग्रह करने लगे, साथ ही आगे की दो रॉ छोड़कर बैठने को कहा। 7.05 बजे मंच पर बतौर अनाउंसर बद्र वास्ती की आमद हुई और उन्होंने करीब 10 मिनट तक जावेद साहब के किस्से सुनाए।
समन्वय भवन का नीचे का हॉल करीब-करीब भर चुका था। इसी बीच 7 बजकर 18 मिनट पर बॉलीवुड के गीतकार, स्क्रीन राइटर और कवि जावेद अख्तर ने हॉल में एंट्री ली। 7.25 तक सम्मान की रस्म हुई और फिर जावेद साहब ने बोलना शुरू किया। बातों की शुरुआत उन्होंने अपने भोपाल में बिताए दिनों से की। करीब 3 मिनट अपने पुरानें दिनों को याद किया। रात 8.45 बजे सवाल-जवाब के सेशन के साथ यह संवाद कार्यक्रम खत्म हुआ। कार्यक्रम समापन की ओर था कि इस बीच 5 मिनट भोपाल की तहजीब यहां के डायलेक्ट पर बात की। यह संवाद कार्यक्रम करीब एक घंटे 20 मिनट तक चला। पूरा कार्यक्रम पॉलिटिकल बातों पर आधारित था लेकिन कार्यक्रम के करीब 8 मिनट ऐसे थे जिसमें उन्होंने नॉन-पॉलिटिकल बाते कीं।
मैंने भोपाल से ही सीखा है इंसानियत और दोस्ती का सबक
जावेद अख्तर ने भोपाल में अपने पुरानें दिनों को याद करते हुए कहा- मेरा बाल-बाल भोपाल के कर्जे में बंधा हुआ है। मेरा बचपन यहां बीता कैम्ब्रिज स्कूल में पढ़ा फिर हम ग्वालियर चले गए। जब मैं 16 बरस का था तो घरवालों से बगावत करके भोपाल आ गया। भोपाल में मुझे सिर्फ मेरे दोस्तों ने ही पाला। मैं 20 की उम्र तक रहा, मैं सैफिया कॉलेज में पढ़ा लेकिन कभी फीस नहीं दी, कॉलेज का ही एक कमरा मिल गया फ्री में। वो कमरा मस्जिद के पास था, बस मैं मस्जिद के इतने पास तक ही गया हूं। यह कोई जुमला नहीं बल्कि सच है कि मैंने इंसानियत और दोस्ती का सबक भोपाल से ही सीखा है।
आज भी मेरे हाथ में है दोस्त का दिया कड़ा
इस दौरान जावेद अख्तर ने कॉलेज टाइम के दोस्त दिनेश राय दिन्नू, फतेह उल्ला खां और मुश्ताक सिंह को याद किया। दिनेश राय दिन्नू तो कार्यक्रम में शामिल होने भी पहुंचे थे। फतेह उल्ला खां का इंतकाल हो गया और मुश्ताक सिंह इंग्लैंड शिफ्ट हो चुके हैं। जावेद साहब ने बताया कि मुश्ताक की बदौलत मैंने कई गुरुद्वारों का हलवा खाया। 1964 में जब मैं भोपाल से गया था तब उसने मुझे अपना कड़ा उतार कर दिया था, तब से वो कड़ा आज भी मेरे हाथ में है। मैं जब मरूंगा तब तक मेरे हाथ में ही रहेगा।
भोपाल की बेगमों पर लिखूंगा बेब सीरीज
कार्यक्रम में जावेद साहब से सवाल किया गया कि अगर आपने यहां के नवाब और बेगम को दिखाया होता तो हमारी पहचान कुछ अलग होती.... इस पर जावेद साहब ने कहा कि आप सही कह रहे हैं। भोपाल की बेगम पर एक किताब 'बेगम्स ऑफ भोपाल' आई है मैंने वो किताब पढ़ी मुझे इस किताब से भोपाल की बेगमों के बारे में बहुत इंट्रेस्टिंग बातें जानने को मिलीं। भोपाल की बेगमों के ऊपर तो फिल्म बननी चाहिए लेकिन वो 2 घंटे की फिल्म नहीं बन सकती है। इसके लिए मैं आप सबसे वादा करता हूं कि मैं कुछ फेमस वेब प्लेटफॉर्म पर बात करके एक वेब सीरीज लिखूंगा। मैं उन कंपनियों का मालिक तो नहीं लेकिन मैं कोशिश जरूर करूंगा कि ऐसा हो और ऐसा होने पर मुझे बहुत खुशी होगी।
आ रिया, जा रिया यहीं से सीखा, भोपाली साउंड इफैक्ट के साथ बोलते हैं
कार्यक्रम के दौरान एक शख्स ने सवाल किया कि आपने फिल्मों में भोपाल और यहां के अंदाज से लोगों को रूबरू कराया और आप तो बड़ी शख्यिसत बन गए लेकिन लोग आज भी भोपाल को आ रिया, जा रिया से ही जानते हैं। यह तो यहां कोई बोलता ही नहीं है। इस पर जावेद साहब ने कहा, मैंने यह डायलेक्ट यहीं से सीखा है, पुराने शहर में देखिए आज भी बहुत से लोग ऐसे ही बोलते हैं। इसके बाद जावेद साहब ने एक भोपाली संवाद सुनाया साथ ही बताया कि पुराने भोपाल के लोगों के बोलने के अंदाज में किस तरह वो साउंड इफैक्ट का भी इस्तेमाल करते हैं।
Published on:
03 May 2019 12:06 am
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