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यहां अब भी चलती है साल में तीस दिन तोप

दो सौ साल से ये चली आ रही परंपरा .

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भोपाल. युद्ध के दौरान किसी जमाने में तोप सबसे बड़े हथियारों में शामिल थी। अब किले और संग्रहालयों में यह शोपीस है। वहीं राजधानी के पास रायसेन जिले के किले से तोप अब भी चलाई जाती है। इसे सिर्फ तीस दिन चलाने के लिए बाकायदा अनुमति जारी की जाती है।

रोजा इफ्तार और सेहरी का समय
रायसेन जिले में रमजान माह के दौरान तोप चलाने की परंपरा है। करीब दो सौ साल से ये चली आ रही है। इसे मॉडर्न समय के साथ भी बदला नहीं गया है। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य लोगों को सेहरी और इफ्तार का समय बताना होता है। इसकी आवाज सुनकर रोजा खोला जाता है। जमीयत उलेमा के इमरान हारून बताते हैं कि पहले रियासत के दौर में एनाउंसमेंट या सामूहिक रूप से समय बताने की कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में किले की ऊंचाई से तोप चला दी जाती थी। इसकी आवाज आसपास के गांवों तक में सुनी जाती। यह सुबह सेहरी का समय बताने तो शाम को इफ्तार के समय के लिए।

कोरोना काल में टूटा क्रम
रायसेन कभी भोपाल रियासत का ही हिस्सा था। रियासत के समय भोपाल में रमजान के दौरान तोप चलाई जाती थी। बदलते वक्त के साथ भोपाल में तोप चलाने का सिलसिला बंद हो गया लेकिन रायसेन में यह परंपरा अब भी बरकरार है। कोरानाकाल के चलते पिछले साल यह क्रम टूट गया था।

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ईद के बाद साफ-सफाई बंद कर देते हैं
इस काम के लिए प्रशासन की ओर से एक महीने का लाइसेंस बकायदा जारी किया जाता है। जब रमजान समाप्त हो जाता है तो ईद के बाद तोप की साफ-सफाई की जाती है और उसे सरकारी गोदाम में जमा कर दिया जाता है।