
,,
भोपाल। कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण स्कूल-कॉलेज करीब छह माह से बंद हैं। पहले पैरेन्ट्स अपने बच्चों को आउटडोर गेम्स खेलने के लिए मोटिवेट करते थे, लेकिन इन दिनों वे उन्हें घर से बाहर भी नहीं जाने दे रहे। बच्चे घर में ही टीवी, मोबाइल या लैपटॉप में गेम्स खेल टाइम स्पेंड कर रहे हैं। कोरोना काल में अब शाम को पार्कों में खेलते-कूदते बच्चों की जगह सन्नाटा दिखाई देता है।
शॉपिंग मॉल्स में बंजी जंपिंग करते बच्चों का शोर अब सुनाई नहीं देता। उनकी वो मस्ती, वो शैतानियां कहीं खो सी गई हैं। वे घरों में कैद हैं। जिसके चलते वे अवसाद का शिकार हो रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर ऑनलाइन पढ़ाई और खाली समय वीडियो गेम खेलने का विपरीत असर दिखाई देने लगा है अब वे चिड़चिढ़ापन महसूस करने लगे हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि घूमने-फिरने सहित बच्चों की आउटडोर एक्टिविटी बंद होने और स्कूल लाइफ पर ब्रेक लगने का सीधा असर उनके मन-मस्तिष्क पर पड़ रहा। ऐसे में बच्चे डिप्रेशन का शिकार हो रहे हैं। इधर, लगातार घर में रहने से वे अलग-अलग समय में कुछ ना कुछ खाने की मांग करते हैं। उनमें बर्गर, फ्रेंच फ्राइज, चाउमीन, मोमोज जैसे जंक फूड खाने की आदत बढ़ गई है। इनसे दिन-प्रतिदिन मोटापा बढ़ता जा रहा है। एक्सपर्ट का कहना है कि जंक फूड ज्यादा खाने से बच्चों की याद्दाश्त कमजोर होने का खतरा रहता है।
बच्चों को बनाकर दें आटे का मोमोज
डायटिशिन डॉ. विनिता मेवाड़ा ने बताया कि लॉकडाउन के बाद से बच्चे घर में हैं। बच्चों की जंक फूड खाने की आदत हो गई है। ध्यान देना होगा कि बच्चे की च्वॉइस भी कंपलीट हो और अच्छी डाइट भी मिले। पीज्जा, बर्गर की जगह स्टफ पराठा बनाकर दें। इसमें टफिंग पनीर की करें इससे वह टेस्टी भी लगेगा। फैमिली मेंबर्स साथ बैठकर खाना खाएंगे तो बच्चे को भी साथ में खाने की आदत हो जाएगी।
फैमिली एक्टिविटी में शामिल करें
मनोचिकित्सक डॉ. रूमा भट्टाचार्या ने बताया कि बच्चों में चिड़चिढ़ापन आ रहा है। बच्चों मेें फिजिकली और साइकोलॉजिकली एनर्जी ज्यादा रहती है। इस एनर्जी को अगर सही चैनल नहीं मिले तो इमोशनल सिमटम्स आ जाते हैं। वे घर में नुकसान करने के साथ ही चोरी करने लगते हैं। अब इस तरह के केसेज भी ज्यादा आ रहे हैं। पैरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों से बातचीत करें। उन्हें किसी काम में इन्वॉल्व करके रखें।
ब्लू इनविजिबल लाइट्स आंखों को करती डैमेज
आई स्पेशलिस्ट डॉ. विनीता रमनानी ने बताया कि बच्चे ऑनलाइन क्लासेस में शामिल हो रहे हैं। वीडियो गेम भी खेलते रहते हैं। मोबाइल में जो ब्लू इनविजिबल लाइट्स निकलती हैं जो आंखों को डैमेज करती है। बच्चे लगातार बिना पलक छपकाए डिजीटल स्क्रीन को देखते हैं। इसकी वजह से आखें में रूखापन आ रहा है। वहीं आउटडोर एक्टिविटी नहीं हो रही है, आखों की मासपेशियों पर जोर पड़ रहा है। जिसकी वजह से बच्चों में माइनस नंबर का चश्मा लगाना पड़ रहा है। इसे मायोपिया कहा जाता है।
Published on:
30 Sept 2020 12:49 am
बड़ी खबरें
View Allभोपाल
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
