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संविधान की रचना के सूत्रधार: संविधान सभा में मध्यप्रदेश के 19 लोगों की पूरी कहानी

संविधान लिखने के लिए बनाई गई समिति में मध्य प्रांत और बरार, मध्य भारत, मध्य प्रांत की रियासत, भोपाल और विंध्य प्रदेश सहित आज के भागौलिक मध्यप्रदेश वाले हिस्से के 19 लोग शामिल हुए।

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भोपाल

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Rajiv Jain

Jan 26, 2022

constituent assembly members Madhya pradesh

constituent assembly members Madhya pradesh

राजीव जैन. भोपाल. करीब तीन साल का समय लगाकर देश का संविधान लिखा गया। 299 सदस्यों की संविधान सभा ने इसे तैयार किया। इसमें से 19 लोग मध्यप्रदेश के हैं। पर मध्यप्रदेश का सागर ऐसा शहर है, जहां की तीन विभूतियों ने संविधान लिखने में महत्ती भूमिका निभाई। इनमें से पहले हैं हरिसिंह गौर विवि के संस्थापक कुलपति डॉ. हरीसिंह गौर, जिन्होंने भारतीय संविधान को संवारने एवं हिंदू लॉ की व्याख्या की। वे दिल्ली और नागपुर विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर रहे और बाद में अपनी पूरी संपत्ति देकर सागर विश्वविद्यालय की स्थापना करवाई। दूसरे हैं अविभाजित मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे पंडित रविशंकर शुक्ल, जिन्होंने हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का सुझाव दिया था। संविधान सभा में इस पर पुरजोर बहस भी की और अंत तक हिंदी को उसका उचित स्थान दिलवाने की जिद को बनाए रखा। आखिरकार अनुच्छेद 343 में प्रावधान किया कि देश की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। तीसरे हैं मलैया परिवार के सदस्य और कोयलाचंल के श्रमिक नेता रतनलाल मालवीय। मजदूरों के नेता के रूप में विख्यात मालवीय 1954 और 1960 में राज्यसभा के लिए चुने गए। मालवीय राष्ट्रीय लेबर वेलफेयर कमीशन के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रिमंडल में सदस्य भी रहे।

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संविधान सभा के सबसे कम उम्र के सदस्य रहे कुसुमकांत
23 जुलाई 1921 को थांदला झाबुआ में जन्मे कुसुमकांत जैन (Kusumkant jain) 28 साल की उम्र में झाबुआ, रतलाम रियासत की ओर से संविधान सभा में सबसे कम उम्र के सदस्य बन गए। स्कूल में ही 1936 में ब्रिटिश शासन के पॉलिटिकल एजेंट का विरोध करने पर विद्यालय छोडऩा पड़ा। इसके बाद पत्रकार रहे, राजपूताना और मालवा में प्रजामंडलों का प्रचार किया। 1939-40 में उज्जैन में मजदूर संगठनों से जुड़े। घर पर कम्युनिस्ट साहित्य बरामद होने से छह माह की सजा हुर्ई। अगस्त क्रान्ति के दौरान वेश बदल झाबुआ, रतलाम आदि में क्रांति की अलख जगाई। झाबुआ में उत्तरदायी शासन के लिए आंदोलन किया, आदिवासियों में गहरी पैठ के चलते झाबुआ नरेश को लोकप्रिय मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए बाध्य होना पड़ा। 18-1-1948 को भारत में सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने। मध्यभारत में भी कैबिनेट मंत्री बने। वे सांसद और विधायक भी रहे। 9 अगस्त 1997 को आजादी की स्वर्ण जयंती पर संविधान सभा के 12 जीवित सदस्यों में शामिल रहे। बाद में इंदौर को अपनी कर्मभूमि बनाया।

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संविधान मूल रूप से हिंदी में लिखवाना चाहते थे सेठ गोविंद दास
जबलपुर में 1896 में जन्मे सेठ गोविंद दास संविधान सभा में हिंदी के प्रबल पक्षधर और भारतीय संस्कृति के संवाहक । वे चाहते थे कि संविधान पहले आम लोगों की भाषा-बोली यानी हिंदी में ही लिखा जाए। बाद में मध्यप्रदेश और बरार क्षेत्र से ही एक और सदस्य रहे डॉ. रघुवीर ने संविधान का पहला खण्ड हिंदी में प्रस्तुत किया इसे दक्षिण भारतीय प्रतिनिधियों ने तवज्जो नहीं दी। हिन्दी के प्रश्न पर कांग्रेस की नीति से हटकर संसद में दृढ़ता से हिन्दी का पक्ष लिया। सेठ गोविंद दास का पालन और शिक्षा उच्च कोटि की हुई, सोलह वर्ष उम्र में 'चंपावती', 'कृष्ण लता' और 'सोमलता' जैसे उपन्यास लिखे। पर गांधीजी के असहयोग आंदोलन का तरुण मन पर प्रभाव पड़ा और वैभवशाली जीवन त्याग स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। दर-दर की खाक छानी, जेल गए, जुर्माना भुगता और सरकार से बगावत के कारण पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकार भी गंवाया। 1947 से 1974 तक वे जबलपुर से सांसद रहे। वरिष्ठतम सदस्य होने के कारण दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं लोकसभा के प्रोटेम स्पीकर रहे। 1961 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।

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रविशंकर शुक्ल
अविभाजित मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रहे पंडित रविशंकर शुक्ल (ravishankar shukla) ने ही हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने का सुझाव दिया। इस सुझाव पर पुरजोर बहस भी की और अंत तक हिंदी को उसका उचित स्थान दिलवाने की जिद को बनाए रखा। आखिरकार अनुच्छेद 343 में प्रविधान किया गया कि भारत संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल भी संविधान सभा के सदस्य थे। संविधान के निर्माण के दौरान हिंदी को राजभाषा का दर्जा और शिक्षा में राज्यों को हस्तक्षेप का अधिकार दिलाने में उनका प्रमुख योगदान रहा है। पंडित शुक्ल समेत राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और सेठ गोविंद दास ने संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में जगह दिलाने के लिए संविधान सभा में जमकर बहस की। खास यह है कि संविधान सभा में हिंदी का समर्थन करने वाले देश के अन्य नेता भी थे, लेकिन वे गैरहिंदी भाषी थे। इसके अतिरिक्त 22 भारतीय भाषाओं को आठवीं अनुसूची में मुख्य भाषा के रूप में मान्यता दी गई। रविशंकर शुक्ल का जन्म दो अगस्त 1877 को सागर में हुआ था। वे स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में खूब सक्रिय रहे। एक नवंबर 1956 को अस्तित्व में आए मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। कार्यकाल के दौरान ही 31 दिसंबर 1956 को उनका निधन हो गया। उनके परिजन अब रायपुर छत्तीसगढ में निवास करते हैं।

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मास्टर लाल सिंह सिनसिनवार
ठाकुर मास्टर लाल सिंह सिनसिनवार (Thakur Lal Singh Sinsinwar ) का जन्म 1889 में भोपाल में हुआ। क्रिश्चियन कॉलेज इंदौर से पढ़े और 1913 में जहांगिरिया स्कूल भोपाल में अध्यापन कार्य शुरू किया। भोपाल में कन्या शाला खोलकर स्त्री शिक्षा का श्रीगणेश किया। वर्ष 1924 में भोपाल में पहला अनाथालय शुरू कराया। वर्ष 1935 में सरकारी नौकरी छोड़कर हिंदू महासभा भोपाल की स्थापना की। साप्ताहिक समाचार प्रजा पुकार निकाला, बाद में किसान व पथ प्रदर्शक के नाम से भी पत्र निकाले जिसमें अछूतोद्धार और नारी चेतना की आवाज बुलंद की। पंडित मदन मोहन मालवीय के परामर्श से प्रजा मंडल नामक राष्ट्रीय संस्था के द्वारा अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार किया। 1949 में भोपाल रियासत के भारतीय गणतंत्र में विलय हो जाने पर भोपाल प्रजामंडल का अखिल भारतीय कांग्रेस में विलय हो गया और वे कांग्रेस में आ गए। 1949 में भोपाल की ओर से कांस्टीट्यूएंट असेंबली में नई दिल्ली भेजा। 4 दिसंबर 1951 में भोपाल के बैरागढ़ रोड पर सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई।

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भगवंतराव मंडलोई
भगवंतराव मंडलोई (bhagwantrao mandloi) का जन्म 10 दिसंबर 1892 में खंडवा में हुआ। उन्होंने 1917 में वकालत की शुरुआत की। 1919 से 1922 तक नगर पालिका के सदस्य के रूप में कार्य किया। 1922 से 1925 तक वे नगर पालिका उपाध्यक्ष रहे। इसके बाद वो स्वतंत्रता आंदोलन में कूद गए। 1939 में व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में भाषण देते हुए खंडवा के घंटाघर चौक से ही गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद वे खंडवा से बाहर निकले। 1957 का आम चुनाव जीतकर अविभाजित मध्य प्रदेश विधान सभा के खंडवा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। पहली बार पंडित रविशंकर शुक्ल की कैबिनेट में मंत्री बने, उनकी मौत के बाद 1 जनवरी 1957 से 31 जनवरी 1957 तक 31 दिन के लिए प्रदेश के पहले कार्यवाहक मुख्यमंत्री बने। इसके बाद कैलाशनाथ काटजू मुख्यमंत्री बने। 1962 में काटजू चुनाव हारे तो 12 मार्च 1962 से 29 सितंबर 1963 तक 18 महीनों के लिए दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। 1970 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।

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हरि विष्णु कामथ
1907 में मंगलूर कर्नाटक में जन्मे हरि विष्णु कामथ (hari vishnu kamath) ने 1933 में अंग्रेजों की आईसीएस परीक्षा पास की। वे नरसिंहपुर कलेक्टर बने। त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के बाद सुभाषचन्द्र बोस से उनकी जबलपुर में मुलाकात हुई। इससे अंग्रेज़ सरकार नाराज हो गई और कामथ को बगावती कलेक्टर माना गया। उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। इससे भी अंग्रेजों का गुस्सा कम नहीं हुआ तो उन्होंने कामथ को सुरक्षा कानून में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। बोस से प्रभावित होकर वे फॉरवर्ड ब्लाक में शामिल हो गए। जनजागरण का अभियान शुरू कर पत्रकारिता करने लगे, इस दौरान उनका लिए गया गांधीजी का इंटरव्यू बेहद चर्चा में रहा। बाद में उन्हें संविधान सभा का सदस्य चुना गया। वे संविधान सभा के प्रभावशाली सदस्य रहे और मौलिक अधिकारों और आपातकालीन अनुच्छेदों पर लंबी बहस की। आजादी के बाद कलेक्टरी वाले इलाके की ही सीट होशंगाबाद नरसिंहपुर (hoshangabad lok sabha constituency) से 1952 में प्रजा समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार के रूप में सांसद का चुनाव लड़कर जीते। नेहरूजी ने कांग्रेस में लाने का प्रयास किया लेकिन वे खुद को विपक्ष के रूप में रखते रहे। इसके बाद 1962 और 1977 में सांसद रहे। 8 अक्टूबर 1982 को नागपुर से बंगलौर जाते समय नागपुर स्टेशन पर हृदय गति रुक गई। रेलवे के अधिकारियों ने साधारण यात्री समझ कर रेलवे अस्पताल के जनरल वार्ड में भर्ती करवा दिया। इस दौरान बरती लापरवाही से 1982 में मौत हो गई। वे जीवनभर अविवाहित रहे, उनकी सम्पत्ति वसीयत के अनुसार कर्नाटक विवि को दे दी गई।

एंग्लो इंडियन नेता फ्रेंक एंथोनी
फ्रेंक एंथोनी (Frank Anthony) का जन्म 25 सितंबर 1908 को हुआ। वे देश के एक प्रमुख एंग्लो-इंडियन समुदाय के नेता थे। जबलपुर से वास्ता रखते थे, संविधान संविधान सभा के सदस्य बने। 3 दिसंबर 1993 में मृत्यु तक उनके नामित प्रतिनिधि संसद में चुने जाते रहे। अखिल भारतीय एंग्लो-इंडियन एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे। वे काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशंस (CISCE) के संस्थापक भी थे, जो ICSE बोर्ड ऑफ एजुकेशन का संचालन करता है।

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राधावल्लभ विजयवर्गीय
30 जनवरी 1912 को राजगढ़ में राधावल्लभ विजयवर्गीय Radhavallabh Vijayvargiya का जन्म हुआ। पिता चतुर्भुज विजयवर्गीय इंजीनियर थे। राधावल्लभ की स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रियता के चलते अंग्रेजों ने उनके पिता को धमकी भरे पत्र लिखे। इससे पिता को नौकरी छोडनी पडी। इसके बाद वे नरसिंहगढ़ Narsinghgarh आ गए थे। राधावल्लभ विजयवर्गीय ने 1932 में गरीबों व अछूतों की सेवा के लिए मित्र मंडल की स्थापना कर लोगों को आजादी के लिए जागरूक करना शुरू किया। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। गांधीजी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया। इसके बाद उन्हें संविधान सभा का सदस्य बनाया गया, बाद में वे 1957 में नरसिंहगढ़ से विधायक भी रहे।

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सीताराम जाजू
29 मई 1915 को नीमच जिले में जन्मे सीताराम सूरजमल जाजू (Sitaram Surajmal Jajoo) स्वतंत्रता आंदोलन से जुडे रहे। उन्होंने सन् 1939 में इलाहबाद विश्वविद्यालय से विधि में स्नातक किया। इसके बाद 1942 में भारत छोडो आंदोलन में भाग लिया। भारतीय संविधान सभा के सदस्य रहे। मध्य भारत में नीमच से विधायक रहे, मध्य प्रदेश के मंत्री भी रहे। 1952 और 1957 जनरल इलेक्शन जीते। 1972-1977 तक मध्यप्रदेश स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन (Madhya Pradesh State Road Transport Corporation) के अध्यक्ष भी रहे। 25 नवम्बर 1983 को उनका निधन हो गया।

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अवधेश प्रताप सिंह
कैप्टन अवधेश प्रताप सिंह Awadhesh Pratap Singh का जन्म 1888 में सतना ज़िले में हुआ। इलाहाबाद अब प्रयागराज से कानून की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे रीवा रियासत की सेना में भर्ती हो गए। वहां वे कैप्टन और कुछ समय तक मेजर भी रहे। नौकरी त्यागकर राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे क्रान्तिकारियों से संपर्क किया, कुछ रियासतों के नरेशों से मिल अंग्रेज़ों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह की योजना बनाई। परंतु समय से पहले भेद खुल जाने पर इसमें सफलता नहीं मिली। इसके बाद वे कांग्रेस में शामिल हुए और 1921 से 1942 तक के आंदोलनों में लगभग चार वर्ष जेलों में बंद रहे। उन्होंने देशी रियासतों में जनतंत्र की स्थापना और समाज उत्थान के लिए निरंतर काम किया। 1948 में विंध्य प्रदेश की स्थापना के बाद (1948 से 1949) तक पहले मुख्यमंत्री रहे। बाद में विंध्य प्रदेश राज्य से भारतीय संविधान सभा के सदस्य मनोनीत हुए। उन्हें (1952 से 1960) तक राज्यसभा के सदस्य चुना गया। 17 जून 1967 को उनका निधन हो गया। उनकी राजनीतिक विरासत पुत्र गोविन्द नारायण सिंह ने संभाली, जो मध्यप्रदेश के 5वें मुख्यमंत्री बने। उनके नाम पर रीवा विश्वविद्यालय का नामकरण किया गया।

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शम्भूनाथ शुक्ल
पंडित शम्भूनाथ शुक्ल (Pandit Sambhunath Shukla) का जन्म 18 दिसंबर 1903 को शहडोल में हुआ। 1920 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेकर जेल गए। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1928 में एलएलबी गोल्ड मेडल मिला। 1929 में वकालत की शुरुआत की। 1937 में कांग्रेस के सदस्य बने। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्हें उमरिया जेल में रखा गया। इस दौरान बेटे की तबीयत खराब हो गई। पंडित शंभूनाथ के पिता माता प्रसाद शुक्ल फरियाद लेकर पहुंचे। अंग्रेजों ने रिहा करने के लिए पं. शंभूनाथ के सामने शर्त रख दी कि वे अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन छोड़ दें, इसके एवज में तहसीलदार बना देंगे। घर में बेटा तड़प रहा था, पर उन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके। दवा और इलाज न मिलने से बेटे की मौत हो गई। 1945 में रीवा महाराज के कानूनी सलाहकार नियुक्त हुए। स्वतंत्रता के बाद वे विंध्य प्रदेश से भारत की संविधान सभा के लिए मनोनीत किए गए। 1952 में अमरपुर से विधायक बने और सर्वसम्मति से विंध्य प्रदेश के (1952 से 1956) तक मुख्यमंत्री रहे। 1956 में विंध्य प्रदेश के विलय तथा नए मध्यप्रदेश के गठन पर उन्हें 31 अक्टूबर 1956 को अपने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 1967 में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में रीवा लोकसभा के सदस्य चुने गए। 1971 में मार्तण्ड सिंह से हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्हें 1971 में ही अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा का प्रथम कुलपति नियुक्त किया। 21 अक्टूबर 1978 को उनका निधन हो गया। 2016 में उनके नाम पर शहडोल विवि का नाम पंडित शंभूनाथ विश्वविद्यालय (Sambhunath Shukla University Shahdol) किया गया।

बाबू रामसहाय
विदिशा में जन्मे बाबू राम सहाय विदिशा जिले में आंदोलन की धुरी हुआ करते थे। उनका घर रामकुटी आजादी के आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने का गढ रहता था। यहां गुप्त रूप से कई बार आंदोलनकारियों की मीटिंग होती थीं। बीच बाजार में मौजूद रामकुटी नाम का इस भवन में अब भी बाबू रामसहाय का परिवार रहता है पर उनके कमरे में आज भी रौब से दमकते चेहरे वाले बाबू रामसहाय और उनसे जुड़ी कई तस्वीरें मौजूद हैं। बाबू राम सहाय नगरपालिका के पहले अध्यक्ष रहे। 1920 में कांग्रेस से जुड़े। महात्मा गांधी और पं. जवाहरलाल नेहरू के संपर्क में आ गए। 1942 में ग्वालियर स्टेट में भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत हुई तो उसकी रणनीति भी रामकुटी में ही बनी, बाबू रामसहाय द्वारा छेड़े गए जनआंदोलन के कारण ग्वालियर स्टेट में विदिशा पूर्ण मद्यनिषेध वाला पहला जिला बना। 1937 में ग्वालियर स्टेट से जुड़े विभिन्न जिलों के आंदोलनकारी शामिल हुए। 1942 में असहयोग आंदोलन और जेल भरो आंदोलन में शामिल हुए। बाद में संविधान सभा के सदस्य बने। बाबू तख्तमल जैन उनके खास मित्र हुआ करते थे।

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विनायक सीताराम सरवटे
इंदौर में 1884 में जन्मे विनायक सीताराम सरवटे (Vinayak Sitaram Sarwate) मराठी स्वतंत्रता सेनानी। ये राजनीतिक नेता और लेखक थे। संविधान सभा के सदस्य रहे। 1966 में तीसरा नागरिक सम्मान पद्म भूषण दिया गया। 1972 में उनकी मौत के बाद 1973 में इंदौर शहर का बस स्टैंड का नाम विनायक सरवटे बस स्टैंड किया गया।

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बृजराज नारायण
बृजराज नारायण लेफ्टिनेंट कर्नल रहे। ग्वालियर रियासत के प्रतिनिधि के रूप में संविधान सभा में चुन गए।

राम सहाय तिवारी
रामसहाय तिवारी कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। वे संविधान सभा में छतरपुर रियासत के प्रतिनिधि रहे। वे रियासत के प्रधानमंत्री भी रहे। स्वतंत्रता के बाद वह 1952, 1957 के संसदीय चुनावों में खजुराहो से लोकसभा के लिए चुने गए।

गोपीकृष्ण विजयवर्गीय, गुना
मध्य भारत के मुख्यमंत्री रहे गोपीकृष्ण विजयवर्गीय भी गुना के रहने वाले थे। ये संविधान सभा के सदस्य बनाए गए। उज्जैन के पंडित सूर्यनारायण व्यास की पु स्तक में भी उल्लेख मिलता है, जिसमें वे कहते हैं कि देश को आजाद हुए तीन साल भी नहीं बीते और कुछ लोग अपने आप को वायसराय समझ सत्ता की कुर्सियों पर बैठ गए।

इनका है मध्यप्रदेश से कनेक्शन
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का जन्म मऊ में हुआ। पर उनका कार्यक्षेत्र शुरू से ही व्यापक रहा, वे संविधान सभा में पहली बार बंगाल से सदस्य चुने गए, वह हिस्सा पाकिस्तान के हिस्से में जाने के बाद उन्हें बाद में बंबई से सदस्य बनाया गया। इसी तरह महान गांधीवादी नेता शंकर त्र्यंबक धर्माधिकारी जिन्हें दादा धर्माधिकारी के नाम से जाना जाता है, वे बैतूल में जन्मे पर 36 साल की उम्र से वर्धा में रहने लगे बाद में महाराष्ट्र को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। उनके परिजन अभी भी भोपाल और बैतूल में रहते हैं।

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क्या है संविधान सभा
अंग्रेजों के देश छोडऩे से पहले ही भारत का अपना संविधान तैयार करने के लिए एक समिति का गठन किया। इसमें तब के 11 ब्रिटिश प्रांतों से 296 सदस्य चुने गए। इनके अतिरिक्त भारतीय रियासतों के 93 प्रतिनिधि भी शामिल हुए। मध्य प्रांत और बरार, मध्य भारत, मध्य प्रांत की रियासत, भोपाल और विंध्य प्रदेश सहित आज के भागौलिक मध्यप्रदेश वाले हिस्से के 19 लोग शामिल थे। इनके अलावा भीमराव आंबेडकर सहित ऐसे भी कई ऐसे लोग थे, जिनका जन्म तो मध्यप्रदेश में हुआ, लेकिन संविधान सभा में वे दूसरे राज्यों से चुनकर आए थे। ब्रिटिश भारत के हिस्से से चुनाव के जरिए और राजशाही वाले हिस्से से मनोनीत कर अपने प्रतिनिधि संविधान सभा में भेजे। संविधान सभा ने 2 वर्ष 11 महीने 17 दिन में संविधान तैयार किया, जिसे 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया। इससे पहले 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के सभी सदस्यों ने संविधान की तीन प्रतियों, एक हस्तलिखित अंग्रेजी, एक छपी अंग्रेजी और एक हस्तलिखित हिंदी पर सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए, जो आज भी मौजूद हैं।