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निजी कंपनी के जरिए होगा गौ-नस्ल सुधार

निजी कंपनी के जरिए होगा गौ-नस्ल सुधार  

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अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे

अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे,अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे,अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे,अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे,अनुदान की पात्र नौ गौशालाओं के संचालक अनुदान को तरसे

भोपाल। प्रदेश में गौ-नस्ल सुधार का काम अब निजी कंपनी के जरिए होगा। देश की दूसरी स्पर्म प्रोडेक्शन लैब की स्थापना में अमेरिका की लायसेंस प्राप्त कंपनी के जरिए काम होगा। उत्तराखंड में भी अमेरिका की कंपनी ही मौजूदा लैब को चला रही है। स्पर्म प्रोडेक्शन लैब में एकमात्र लायसेंस वाली कंपनी होने के कारण मध्यप्रदेश में भी उसे ही काम दिया जाएगा। इसके तहत इस तरह की व्यवस्था की जाएगी कि बेहद कम कीमत देकर कोई भी किसान या पशुपालक बेहतर नस्ल की गाय (बछिया) को ले जा सके। इसमें पहले से गौ-जन्म को नियंत्रित करके बछड़े की तुलना में बछिया का जन्म ही कराया जाएगा।

वर्तमान में देश में केवल उत्तराखंड में इस प्रकार की स्पर्म प्रोडेक्शन लैब है। इसके बाद मध्यप्रदेश के भोपाल में भदभदा क्षेत्र में दूसरी लैब को पिछले दिनों कमलनाथ कैबिनेट ने मंजूरी दी है। इसमें ४७.५५ करोड़ रुपए खर्च होंगे, जिसमें से ६० फीसदी राशि केंद्र से मिलना है। खास बात ये कि केंद्र से इसकी पहली किश्त के १८ करोड़ आ भी चुके हैं। इस कारण इसकी स्थापना के काम को तेजी से किया जाएगा। मार्च २०२० तक इसकी स्थापना के काफी कम पूरे करने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें सेक्सिन टेक्नोलॉजी के जरिए गायों के स्पर्म को प्रोड्यूस करके बेहतर नस्ल वाली बछिया पैदा की जाएंगी।

कीमत का निर्धारण भी जल्द

बेहतर नस्ल की बछिया को लेने के लिए किसानों या पशुपालकों को एक निश्चित राशि भी चुकाना होगी। इसके लिए औसत ७५० रुपए रखने का विचार है। हालांकि मूल्य निर्धारण में अभी समय लगेगा। लेकिन, उत्तराखंड में करीब १२०० रुपए प्रति बछिया लिए जाते हैं। मध्यप्रदेश में इससे कम राशि रखी जाएगी।


90 फीसदी सक्सेस रेशो

इस लैब के जरिए गौ-नस्ल सुधार में ९० फीसदी सक्सेस रेट है। इसके अभी तक के प्रयोग बताते हैं कि बछिया और बछड़े के जन्म को लेकर प्रति १०० पर ९० बछिया और १० बछड़े का रेशों है। उत्तरखंड से पहले भी पॉयलेट प्रोजेक्ट में यही रेशो आया था। मध्यप्रदेश में भी इसी सक्सेस रेट का अनुमान है।

बछिया ही क्यों

स्पर्म लैब के जरिए गौ-नस्ल सुधार में बछिया की संख्या ज्यादा रखने के पीछे दुधारू पशु की उपयोगिता है। दरअसल, बछिया बड़े होकर गाय के रूप में दूध देती है। इसलिए लोग उसे आवारा कम छोड़ते हैं। जबकि, बछड़ा बड़े होकर सांड के रूप में सड़कों पर आवारा अधिक घूमते हैं। इस कारण मादा दुधारू पशु के कारण गौ-नस्ल सुधार में मादा जन्म को बढ़ाया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे सड़कों पर आवारा पशु के घूमने में भी कमी आएगी।