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छू से कांपती थी पुलिस, एक बच्चे से थर्राती थी गैंग, ऐसी है डॉन के नामों की दिलचस्प कहानी

शहर के कुछ ऐसे भी बदमाश है, जिन्होंने अपराध के रास्ते को छोड़ दिया. अब वो शराफत की जिदंगी बसर कर रहे हैं। किसी के पास सरकारी नौकरी है, तो कोई प्राइवेट कामकाज से अपने परिवार का पेट पाल रहा है।

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Pankaj Shrivastav

Jul 15, 2017

Criminal nickname

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भोपाल। इंसान जब दुनिया में पैदा होता है तो सबसे पहले उसकी पहचान तय की जाती है। लाड-प्यार में कुछ निकनेम रख दिए जाते हैं फिर बच्चे के बड़े होने पर उसके हाव-भाव देखते हुए कई बार उन्हें बदल भी दिया जाता है लेकिन जब जीवन में कुछ दाग लगते हैं तो वह पहचान कोई भी नाम नहीं बदल सकता। अपराध जगत की काली गलियों में आज भी ऐसे कई नाम जिंदा हैं जो कभी यहां राज किया रहते थे। लोगों ने जुर्म का रास्ता छोड़ दिया है पर उन दागों से निकले नाम आज भी उनकी पहचान बने हुए हैं।

mp.patrika.com आपको बताने जा रहा है भोपाल के ऐसे डॉन और माफिया की कहानी जिसने जुर्म का दामन छोड़ दिया है पर उनकी पहचान अब भी जिंदा है...

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दिलचस्प हैं इनके नाम
भोपाल में बदमाशों को टोपी, बम, पेंटर, काला, रेडियो, बकरा, टैंकर, बघीराज और छू् जैसी उर्फियत से जाना जाता है। बदमाशों को यह नाम पुलिस वालों ने या गैंग के लोगों ने ही दिए हैं। पुलिस एफआईआर में भी उनके वास्तविक नाम के साथ उर्फियत जुड़ी रहती है। हालांकि इनमें से कई लोग अब शराफत की जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं पर उनकी अपराधिक पहचान नाम के साथ आज भी जिंदा है।

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घनश्याम उर्फ तोडफ़ोड़
एक वक्त था जब शहर में कहीं भी तोडफ़ोड़ होती थी तो सब घनश्याम यानि तोडफ़ोड़ पर उंगली उठाते थे। हालांकि घनश्याम अब भगवान में आस्था रखते हैं और स्वास्थ्य विभाग में सरकारी नौकरी कर रहे हैं लेकिन एक वक्त था जब वो किसी की नहीं सुनते थे। घनश्याम कहते हैं कि पहले दिमाग बहुत गर्म रहता था, मैं मारपीट से ज्यादा तोडफ़ोड़ करता था इसलिए लोगों ने मुझे यह पहचान दे दी।

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सरकार का राज
सचिन 15 साल का वह बच्चा जो छोटी सी उम्र में बड़े सपने देखने लगा लेकिन उन सपनों को पूरा करने का सही रास्ता तय नहीं कर पाया। एक दिन अंजाने में अपराध हुआ और फिर वह उसी रास्ते पर आगे बढ़ गया। इतनी छोटी सी उम्र में सचिन पुणे जेल में सजा काट चुका था। इसके बाद उसके नाम के साथ नई पहचान जुड़ी बच्चा। यह बच्चा आज प्राइवेट नौकरी कर जिंदगी बसर कर रहा है लेकिन उस पर अब भी 15 से ज्यादा आपराधिक मामलों के केस चल रहे हैं। शुभम कहता है कि बचपन में की कई एक गलती ने पूरे जीवन की पहचान बदलकर रख दी।

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शुभम से बना सरदार
जिसके नाम में ही शुभ हो उसके साथ कभी कुछ गलत कैसे हो सकता है लेकिन नाम को बदल दिया गया सरकार से। सरकार एक गैंग का वो लीडर जिसकी हिम्मत के आगे कभी पुलिस भी जवाब दे गई थी। मात्र दो सालों में 30 संगीन जुर्म का रिकार्ड बनाकर शुभम सरदार बन गया था। लेकिन प्यार हुआ, शादी हुई और परिवार बन गया। इसके बाद फिर कभी बुराई की ओर मुंह नहीं किया। आज ठेकेदारी करके वह परिवार को अच्छा जीवन देने की कोशिश में लगा हुआ है।

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जाने अनोखे अपराधियों के दिलचस्प नाम
0 टीलाजमालपुरा निवासी राजेश छू और उसका भाई कपिल छू काफी फेमस हैं।
0 पुराने शहर के नामी बदमाश रहे मून्ने पेंटर और पप्पू पेंटर मकानों में पुताई का काम करते थे।
0 जहांगीराबद के बदमाश सलीम की जब भी गिरफ्तारी होती थी, तो उससे देशी कट्टा बरामद होता था इसलिए अब उसे 6 राउंड कहा जाता है।
0 शहर के इंद्रानगर कालोनी निवासी बदमाश रईस एक दुकान पर रेडियो सुधारने का काम करता था, जिसे रेडियो टांगकर गाने सुनने का भी शौक था। इसलिए उसे अब भी रेडियो के नाम से जाना जाता है।
0 15 अगस्त 1994 में बिजली कालोनी की दीवार के पास एक बम ब्लास्ट हुआ था...इस मामले में अशोका गार्डन के फईम को गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद अब उसे फईम बम के नाम से जाना जाता है।