
कथक से दिखाया कृष्ण के विभिन्न रूपों का वर्णन
भोपाल। मध्यप्रदेश के 64वें स्थापना दिवस समारोह के दूसरे दिन शनिवार को रवीन्द्र भवन में बुंदेली लोक गायन, मांगणियार गायन, समूह कथक नृत्य, लोकनृत्य पुरुलिया छाऊ और गणगौर लोकनृत्य की प्रस्तुतियां हुईं। औरंगाबाद की कथक नृत्यांगना पार्वती दत्ता ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से कृष्ण के विभिन्न रूपों और गोपियों के कृष्ण के प्रति प्रेम का वर्णन किया।
उन्होंने प्रस्तुति की शुरुआत एकल नृत्य में प्रार्थना से की। ये बंदिश साढ़े नौ मात्रा में निबद्ध थी। महाराष्ट्र में गाई जाने वाली प्रार्थना 'जय-जय राम कृष्ण हरि' के माध्यम से उन्होंने भाईचारे को प्रदर्शित किया। ताल पक्ष को विस्तार देते हुए उन्होंने 'याद कर ले तू अपने बंदे की, मात-पिता सुत न कोई न तेरा...' पर एकल प्रस्तुति दी। कार्यक्रम को विस्तार देते हुए उनकी तीन शिष्याएं शीतल हमरे, श्रेया दीक्षित और रसिका तलेकर ने रास पंचाध्यायी की प्रस्तुति दी।
भगवान कृष्ण गोपियों के साथ रास कर रहे
अष्टछार कवि संत नंददास की काव्य रचना पर आधारित ये प्रस्तुति राग रागेश्वरी चौताल में निबद्ध थी। इस प्रस्तुति में उन्होंने रास का वर्णन करते हुए दिखाया कि भगवान कृष्ण गोपियों के साथ रास कर रहे हैं। इस रासलीला का साक्षी एक वृक्ष है। अगली कड़ी में चतुरंग की प्रस्तुति हुई, इसमें उन्होंने ताल धमाल का वर्णन किया जो पखावज प्रधान थी। इस प्रस्तुति में उन्होंने साहित्य, सरगम और ताल के स्वभाव के बारे में बताया।
ताल प्रधान इस प्रस्तुति में उन्होंने राग हिंडोल में 'बाजत ताल धमाल...' पर नृत्य पेश कर समां बांध दिया। अंतिम प्रस्तुति ठुमरी में उन्होंने कृष्ण के विभिन्न रूपों का वर्णन किया। 'मुरतिया मन में बसी तोरी श्याम, गोकुल में ढूंढा, वृंद्धावन में ढूंढा ढूंढा तुझे हर धाम...' के माध्यम से दिखाया कि कृष्ण को कोई प्रेमी, कोई बालक, कोई योद्धा तो कोई वैरागी रूप में प्रेम करता है।
महिषासुर के वध की कहानी में 12 किलो की कॉस्ट्यूम
स मारोह की पश्चिम बंगाल के लोकनृत्य पुरुलिया छाऊ की हुई, जिसमें पश्चिम बंगाल में 250 वर्षों से प्रचलित पौराणिक कथा महिषासुर मर्दिनी प्रसंग की प्रस्तुति दी। इस नृत्य प्रस्तुति का संयोजन सुरेंद्र पांडे ने किया। इस नृत्य में कलाकार 12 किलो वजनी मुखौटे और कॉस्ट्यूम पहनकर नृत्य करते हैं। इन मुखौटो को मिट्टी से ऑर्गेनिक कलर्स की मदद से तैयार किया जाता है।
इससे पहले कार्यक्रम की शुरुआत सागर के कलाकार शिवरतन यादव ने मंगल गीत, विवाह गीत, लेद गायन, लोक कवि इसरो की चौकड़ी, मेले और तीर्थों पर गाए जाने वाले दिबोलिया गीत के साथ दी। अगली प्रस्तुति राजस्थान के प्रतिष्ठित मांगणियार गायक गाजी खान और उनके दल ने 'केसरिया बालम हमार, पहला झिलमिल बरसे मेह, दमादम मस्त कलंदर...' आदि गीतों की प्रस्तुति दी।
समारोह के दूसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति साधना उपाध्याय के संयोजन में तैयार किए गए निमाड़ांचल के गणगौर लोकनृत्य की हुई, जिसमें 16 कलाकारों द्वारा अपने सिर पर शिव-पार्वती को धारण कर उनकी आराधना नृत्य संगीत के माध्यम से की गई। ये प्रस्तुति मनमोहक रही।
Published on:
04 Nov 2019 12:20 pm
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