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राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अंतर को ठीक से समझना होगा- डॉ. सिंह

महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय में 'हिंदी कविता में राष्ट्रीय संचेतना' विषय पर शोध-संगोष्ठी आयोजित

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राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अंतर को ठीक से समझना होगा- डॉ. सिंह

भोपाल। महारानी लक्ष्मीबाई कन्या महाविद्यालय में हिंदी विभाग ने एक दिवसीय शोध संगोष्ठी 'हिंदी कविता में राष्ट्रीय संचेतना; विषय पर आयोजित की गई। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि निदेशक साहित्य अकादमी डॉ. उमेश कुमार सिंह तथा सत्र की अध्यक्षता पद्मश्री प्रो. रमेश चंद्र शाह ने की। मुख्य वक्ता डॉ. सत्यकेतु सांकृत रहे। डॉ. सिंह ने कहा कि संचेतना शाश्वत है राष्ट्रीय चेतना का संवाहक तत्व निष्ठा है। सत्य निष्ठा का अर्थ है राष्ट्र और राष्ट्र की भूमि के प्रति हमारा नाता, हमारा संबंध माता और पुत्र के समान हो। भारत एक चिरपुरातन राष्ट्र है हमें वर्तमान समय में राष्ट्र, राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद के अंतर को ठीक से समझना होगा।

वहीं, डॉ. सांकृत ने कहा कि राष्ट्रीय संचेतना को समझने के लिए उसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर भी ध्यान देना चाहिए। राष्ट्रीय संचेतना राष्ट्रीय पुनर्जागरण की कोख से पैदा हुई है। राष्ट्रीय चेतना का विकास सबसे पहले किसी की कविताओं में हुआ है तो उनमें सबसे पहले भारतेंदु हरिशचंद्र आते हैं वे सजग रचनाकार हैं उन्होंने तत्कालिक दुर्दशा को कविता में उजागर करने का कार्य किया है।

प्रो. शाह ने कहा कि साहित्य मनुष्य के सभी आयामों को प्रतिष्ठित करता है, विकसित करता है। अपमान और दलन से ही कविता का जन्म होता है। उन्होंने अरविंद घोष एवं महात्मा गांधी के साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि महात्मा गांधी द्वारा लिखित हिंद स्वराज राष्ट्रीय संचेतना से भरी पड़ी हैं।


देह और देश अलग नहीं
प्रथम विचार सत्र में वक्ता प्रेमशंकर शुक्ल ने कहा कि राष्ट्र जल, जंगल, जमीन एवं प्रकृति व मनुष्यों से मिलकर बनता है। देह और देश अलग नहीं है। सबसे पहले अपने आप को समझना होगा, स्वयं के चेतना को समझना होगा तभी हम राष्ट्र की संचेतना को समझ पाएंगे। इसी सत्र में डॉ. शैलेंद्र कुमार, ओम भारती ने अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन डॉ. विजयलक्ष्मी राय एवं आभार डॉ प्रज्ञा थापक ने किया।

राष्ट्रीय काव्य सुधारवादी काव्य
द्वितीय विचार सत्र में डॉ. रामेश्वर तिवारी ने राष्ट्रीय काव्य को सुधारवादी काव्य बताते हुए कहा कि यह मानव के जीवन में उत्साह एवं मार्ग प्रशस्त करने का कार्य करता है। सत्र की अध्यक्षता कर रहे डॉ. नरेंद्र दीपक ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण होता है लेकिन वर्तमान में काफी हद तक इसका अभाव है। साहित्य का समाज पर और समाज का साहित्य पर स्वभाविक ही प्रभाव पड़ता है। इस सत्र का संचालन डॉ. अणिमा खरे एवं आभार डॉ. संगीता सक्सेना ने व्यक्त किया।