
दिलीप साहब तीन बार आए भोपाल, यहां की खूबसूरती और जबान-शायरी उन्हें बहुत पंसद थी,दिलीप साहब तीन बार आए भोपाल, यहां की खूबसूरती और जबान-शायरी उन्हें बहुत पंसद थी
भोपाल। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार का तीन बार भोपाल आना हुआ। उन्होंने भोपाल के पास बुधनी घाट में फिल्म नया दौर की शूटिंग की थी। यहां एक महफिल का आयोजन किया गया, जिसमें भोपाल की कव्वाल शकीला बानो ने प्रस्तुति दी। उनके गाने को सुनकर दिलीप साहब ने कहा कि आप यहां क्या कर रही हैं, आपको तो मुंबई में होना चाहिए और फिर शकीला बानो इंडस्ट्री की पहली महिला कव्वाल बन गईं। उन्होंने जो इज्जत और शोहरत हासिल हुई, उसका श्रेय वह हमेशा से दिलीप कुमार को देती रहीं।
10 हजार लोगों की लगती थी भीड़
उस समय जब फिल्म 'नया दौर' की शूटिंग होती थी तब भोपाल के लगभग दस हजार लोग दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला स्टारर फिल्म की शूटिंग को देखने के लिए बुधनी घाट पर जमा होते थे। इस फिल्म की पूरी आउटडोर शूटिंग बुधनी में हुई थी। शूटिंग के लिए करीब आठ माह तक फिल्म से जुड़ा क्रू यहां मौजूद रहा। फिल्म में एक स्टंट सीन की शूटिंग के दौरान वे हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बच गए थे।
फिल्म सेट के लिए थे फोटोज
शहर के सयैद ताहा पाशा ने बताया कि उस समय मेरे पास फुजिओ कंपनी का कैमरा हुआ करता था। मैं 1960-61 में रायसेन जिले में पढ़ाई कर रहा था। मुझे शूटिंग का पता चला तो पिताजी की मोटरसाइकिल लेकर वहां पहुंच गया। सेट पर मौजूद लोगों को लगा कि मैं मुंबई की किसी बड़े प्रेस से आया हूं। मैंने उस सेट के दस से ज्यादा फोटोज क्लिक किए थे। मेरे पास उसकी निगेटिव रखी है जो 2.5 गुणा 3 इंच की है। वो दो बार 1980 के आसपास भी भोपाल आए थे। एक बार संजय गांधी क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में शायरा बानो के साथ आए। उन्हें यूनियन कार्बाइड के गेस्ट हाउस में ठहरा गया था। दोनों ने ताजूल मसाजिद और गौहर महल का दीदार भी किया था।
एक्टिंग स्कूल थे दिलीप साहब
दिलीप साहब की बहन सकीना मेरे पिताजी को अपना भाई मानती थी। इसलिए बचपन से ही मेरा उनके घर आना-जाना था। हम जब भी उनसे मिलते, उनके चेहर पर एक संत के जैसी मुस्कुराहट होती थी। मैंने उनके साथ 1989 में फिल्म 'कानून अपना-अपना' में काम किया था। इसकी शूटिंग हैदराबाद में हो रही थी। उस समय मेरी पत्नी और एक साल की बेटी भी साथ थी। उन्हें शूट के दौरान जब भी समय मिलता वे बेटी को गोद में उठा लेते और रूमाल का चूहा बनाकर उसे खिलाने लगते। उन्होंने मुझसे कहा था कि जीवन में ना कहना सीखो। हर काम के पीछे मत भागो, बल्कि क्वालिटी पर फोकस करो। उतना ही काम लो, जितना तुम कर सकते हो। वे एक एक्टर नहीं तपस्वी थे, कर्मयोगी थे। उनमें सिर्फ और सिर्फ अच्छा काम करने की ही ललक थी। वे एक्टिंग का एक ऐसा स्कूल थे, जिससे हर दौर का एक्टर प्रभावित रहा।
रजा मुराद, एक्टर
उनसे मिलने किया दस साल तक इंतजार
मैं बचपन से ही दिलीप साहब बड़ा फैन रहा हूं। उनकी फिल्म राम और श्याम मैंने करीब दस बार भारत टॉकीज में जाकर देखी थी। जब उनका शायरा बानो से निकाह हुआ तो हमारे दोस्त जहूर मियां ने बुधवारा में कव्वाली का प्रोग्राम कराया था। मैं 1986 के आसपास मुबंई पहुंचा। वहां जाकर मेरी एक ही तमन्ना थी कि मैं उनसे मुलाकात कर सकूं। ये ख्वाहीश करीब 10 साल बाद मेरे मित्र सुमित सहगल ने पूरी की। बर्थडे पार्टी में जब उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि मियां तुम्हारी उर्दू बहुत अच्छी है, तुम्हारे बोलने का लहजा हमें बहुत पसंद आया। दरअसल, उन दिनों मेरा एक धारावाहिक 'हिना' टीवी पर आता था, उसमें दिलीप साहब ने मुझे देखा और सुना था। वे आखिरी बार किसी पब्लिक फंक्शन में सिंटा की बिल्डिंग की नींव रखने आए थे। उस समय फीता काटते हुए उनके हाथ कांप रहे थे। मैंने अपने हाथों में उनके हाथों को थामा, वो पल मुझे जिंदगीभर याद रहेगा।
राजीव वर्मा, एक्टर
Published on:
08 Jul 2021 05:00 am

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