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घसीटा राइटिंग में ही डॉक्टर लिख रहे दवाई

सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों के पर्चे पर दवाओं को लेने का तरीका भी स्पष्ट नहीं, मरीजों को हो सकता है नुकसान

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Krishna singh

Sep 04, 2016

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भोपाल. मप्र मेडिकल काउंसिल ने सभी डॉक्टरों के लिए मरीजों को दवाएं लिखने के लिए एक मॉडल प्रिस्क्रिप्शन फॉर्मेट लागू किया था, लेकिन राजधानी के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर इसकी धज्जियां उड़ा रहे हैं। डॉक्टर ओपीडी में आने वाले मरीजों को पर्चे पर एेसी राइटिंग में दवाएं और डोज आदि लिख रहे हैं कि मरीज और उनके परिजनों को समझना मुश्किल है। सरकारी अस्पतालों में कोई बताने वाला भी नहीं होता कि दवाएं कैसे लेना हैं। मरीज यह भी नहीं समझ पाते कि उन्हें अस्पताल से सभी दवाएं मिल गई हैं या कुछ रह गईं हैं। काउंसिल ने भी दोबारा यह नहीं देखा कि इसका पालन हो रहा है या नहीं।

मध्यप्रदेश मेडिकल काउंसिल सभी सरकारी और निजी डॉक्टरों के लिए एमसीआई द्वारा जारी प्रिस्क्रिप्शन फॉर्मेट जारी कर भूल गई। इस फॉर्मेट में डॉक्टर के नाम रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ मरीज का नाम, उसका मर्ज, दवाएं, दवा की क्षमता, उसे लेने संबंधी निर्देश और कितने दिन तक लेना है, यह लिखना जरूरी है। लेकिन सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर दवाओं के अलावा कुछ भी नहीं लिख रहे हैं। दवाएं और इंस्ट्रक्शन भी इतनी घसीटा राइटिंग में लिखे जा रहे हैं कि मरीजों को समझ नहीं आता। सरकारी अस्पतालों में दवाएं लेने के लिए भी लंबी लाइन लगती है। दवा वितरण करने वाले के पास भी इतना समय नहीं होता कि वह बता सके कि दवा कितने टाइम और कितनी मात्रा में लेना है। इससे अधिकांश मरीज हर दवा कम से कम दो टाइम लेते रहते हैं। एेसे में कुछ दवाएं नुकसान भी कर सकती हैं।

मरीजों की संख्या ज्यादा
रिटायर्ड अधीक्षक हमीदिया अस्पताल डॉ डीके वर्मा के अनुसार आदर्श स्थ्िितयों में एक डॉक्टर को दिन में 20 से 30 मरीज देखना चाहिए। लेकिन सरकारी अस्पतालों में एक डॉक्टर ओपीडी में 60 से 80 तक मरीज देखता है। इसलिए उसका मुख्य मकसद सभी मरीजों को देखना रहता है। राइटिंग दवा वितरक समझ लेते हैं। लेकिन दवाओं को लेने संबंधी निर्देश जरूर डॉक्टर को स्वयं देना चाहिए।

कोई देखने वाला नहीं
मेडिकल काउंसिल ने भी प्रिस्क्रिप्शन फॉर्मेट और निर्देश जारी करने के बाद दोबारा यह नहीं देखा कि इसका अस्पतालों में पालन हो रहा है या नहीं। मप्र एमसीआई के अध्यक्ष डॉ. जीएस पटेल का कहना है कि मॉडल प्रिस्क्रिप्शन फॉर्मेट का पालन मरीजों के हित में है। लेकिन मरीज ज्यादा होने से इसका पालन नहीं हो पाता है।