
समाज और राजनीति पर बड़ा कटाक्ष
भोपाल. आहान शिक्षा संस्कृति एवं समाज कल्याण समिति की ओर से गुरुवार को नाटक मदारीपुर जंक्शन का मंचन किया गया। बालेन्दु द्विवेदी के उपन्यास का नाट्यलेख नवल शुक्ल और निर्देशन आलोक चटर्जी ने किया। एक घंटे 20 मिनट में 14 कलाकारों ने ऑनस्टेज अभिनय किया है। मदारीपुर गांव में जाति-वर्ण के बीच टकराव पर व्यंग्य किया गया है। नाटक अपने ग्रामीण कलेवर में कथा के प्रवाह के साथ विविध जाति-धर्मों के ठेकेदारों की चुटकी लेता है। इसमें कुल 22 सीन रहे, जो अलग-अलग एपिसोड की तरह थे। हर एपिसोड कहानी को जोड़ते हुए आगे ले जाता है। मुख्य किरदार बैरागी बाबू और छेदी बाबू हैं। नाटक गांव के प्रधान के चुनाव पर केंद्रित है। यहां चुनाव में बुनियादी तौर से दो दल हैं। एक छेदी बाबू का, दूसरा बैरागी बाबू का। बैरागी जहां धार्मिक लीडर है, वहीं, छेदी अदालती मामलों का जानकार है। चुनाव के वोटों के समीकरण से दलित वर्ग का चइता भी परधानी का ख्वाब देखता है और भगेलू भी, पर दोनों छेदी और बैरागी के दांव के आगे चित हो जाते हैं। चइता को छेदी का भतीजा मार डालता है। नाटक में देखो रे देखो खेला मदारीपुर का, मेघा सारे पानी दे, बना ले अपना भरतार सजनी, लूट ले जोबनवा... सहित 1970 के दशक के हिन्दी फिल्मी गीतों को शामिल किया गया।
क्रांति की अलख जगाता है बिरजई
चइता का दोस्त बिरजई पुलिस और नेताओं से अपने समाज के लिए लड़ता है। इधर बैरागी बाबू रामलीला कराते हैं, तो छेदी बाबू रासलीला। चइता की पत्नी मेघिया भी चुनाव लड़ती है और दो वोट से जीत जाती है, लेकिन चइता की मौत से अर्ध विक्षिप्त हो मेघिया जीत की घोषणा सुनकर पति की समाधि पर पहुंचती है। जीत कर भी हरिजन टोले के सौभाग्य व स्वाभिमानी पीढ़ी को देखने के लिए मेघिया जिंदा नहीं रह जाता।
Published on:
08 Nov 2019 02:00 am
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