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हाशिए पर जीवन जीने वाले महिलाओं का कोलाज है सकुबाई

शहीद भवन में चल रहे एकजुट नाट्य समारोह के दूसरे दिन नाटक 'सकुबाई' का मंचन किया गया। नादिरा जहीर बब्बर लिखित कहानी पर बने नाटक का निर्देशन जयंत देशमुख ने किया है।

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भोपाल। कठिनाईयों के बीच पली-बढ़ीं, शादी के बाद परिवार की जिम्मेदारियों को ओढ लेना और फिर बच्चों के सपने पूरे करने वाली माताएं अगली पीढिय़ों के लिए उम्मीद की एक नई रोशनी देकर जाती हैैं, उनके संघर्ष देखकर ही बच्चे भी जुझारु बनते हैैं। अंधकार में डूबे जीवन को उजियाले में लाने वाली नादिरा जहीर बब्बर की ऐसी ही एक कहानी पर शुक्रवार को शहीद भवन में नाटक 'सकुबाई' का मंचन हुआ। मुंबई पर आधारित कहानी में घरों में काम करने वाली बाई की कहानी है। सकु की मां तो उसे शिक्षित नहीं कर सकी पर वह अपनी बच्ची को पढ़ाने के लिए 4-5 घरों में काम करती है।

दूसरों के घरों में काम कर बेटी को पढ़ाया
यह नाटक इस वर्ग की लड़कियों पर छोटी सी उम्र से रोटी कमाने के दबाव, बाध्यता और उसमें से जिंदगी को जिंदगी से भरपूर रखने की चाहत और जीवटता को दिखाता है। साथ ही तथाकथित पढे-लिखे, सुसंस्कृत उच्चवर्गीय समाज के खोखले पन को दर्शाता है। बचपन से ही परेशानियों ने सकुबाई को घेरे रखा है। बचपन में उसके छोटे मामा द्वारा दुष्कर्म किया गया था और कई कोशिशों के बावजूद वह मां से यह बात नहीं छिपा पाई थी। अपनी मासूम बेटी के साथ घर में ही दुष्कृत्य की बात जान कर उसकी मां बच्चों को साथ लेकर घर छोड़कर चली जाती है।

बेटी को बड़ी लेखिका बनाकर उसके सपने को पूरा करती है

वहां से एक चिंता भी वह साथ ले जाती है कि अगर किसी और को यह बात पता चली तो फिर लड़की से शादी कौन करेगा? बहरहाल... सकूबाई की गृहस्थी भी बसती है और बेटी की किलकारी भी उसके आंगन में गूंजती हैं। पति की बीमारी में सकू जी जान से उसकी सेवा करती है लेकिन कुछ समय बाद पति भी उसे छोड़ जाता है। ऐसी तमाम मुश्किलो के बाद भी वह हार नहीं मानती, घर के खर्च और बेटी को पढ़ाने के लिए वह 4-5 घरों में बाई का काम करती है और अपनी बेटी को बड़ी लेखिका बनाकर उसके सपने को पूरा करती है।