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संवेदनाएं का मर जाना राष्ट्र निर्माण के लिए घातक – डॉ. सुब्बाराव

नेहरू युवा केंद्र ने रविवार को स्व'छ भारत समर इंटर्नशिप के तहत भारत की संकल्पना विषय पर कार्यक्रम आयोजित

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Gandhi Bhavan

भोपाल। नेहरू युवा केंद्र ने रविवार को स्व'छ भारत समर इंटर्नशिप के तहत आयोजित भारत की संकल्पना विषय पर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम को गांधीवादी चिंतक डॉ. एसएन सुब्बाराव ने संबोधित किया। उन्होंने नौजवान आओ रे नौजवान गाओ रे, लो कदम मिलाओ ये, लो कदम बढ़ाओ रे, इस गीत की पंक्तियों के साथ उद्बोधन शुरू किया।

उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में हम अपने परिवार से दूर होते जा रहे हैं जिसके कारण हमें तनाव से गुजरना पड़ रहा है, पहले हमारी मन की बात सुनने के लिए, दिल की बात सुनने के लिए हमारे आस-पास हमारे परिवार जन होते थे लेकिन बदलते दौर में जब मन की बात, दिल की बात सुनने के लिए लोग तैयार नहीं तो हमें आकाशवाणी और दूरदर्शन का सहारा लेना पड़ रहा है।

आज हमें संवेदनशील बनने की आवश्यकता है, संवेदनाओं का मर जाना राष्ट्र निर्माण के लिए बहुत ही घातक है नहीं तो मंदसौर जैसी घटनाएं हमारे बीच में होती रहेगी और हम मूक दर्शक बनकर देखते रहेंगे। अहिंसा परमो धर्म का संदेश देने वाली धरती पर ही हिंसा की घटनाएं दिनों दिन बढ़ती जा रही है, आखिर मानव समाज कहां जा रहा है।

उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास कुछ करने का हौसला और चिंतन क्षमता है तो मैं 88 वर्ष का होकर भी नौजवान हैं जबकि कोई व्यक्ति 18 वर्ष का है और उसके कोई सपने और कुछ कर गुजरने का हौसला नहीं है तो वह बुजुर्ग हैं। मैं इसी सिद्धांत पर इस उम्र में भी युवाओं के साथ काम कर रहा हूं, आज हम भारत को विश्व में सिरमौर बनाना चाह रहे हैं तो उसके लिए आवश्यकता है एक स्वस्थ मन की, उसके लिए हमें एक घंटा देह को और एक घंटा देश को देना होगा।

उन्होंने कहा कि अगर किसी व्यक्ति के पास कुछ करने का हौसला और चिंतन क्षमता है तो मैं 88 वर्ष का होकर भी नौजवान हैं जबकि कोई व्यक्ति 18 वर्ष का है और उसके कोई सपने और कुछ कर गुजरने का हौसला नहीं है तो वह बुजुर्ग हैं। मैं इसी सिद्धांत पर इस उम्र में भी युवाओं के साथ काम कर रहा हूं, आज हम भारत को विश्व में सिरमौर बनाना चाह रहे हैं तो उसके लिए आवश्यकता है एक स्वस्थ मन की, उसके लिए हमें एक घंटा देह को और एक घंटा देश को देना होगा।

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विश्व में भारत जैसा विविधता बहुल देश कहीं नहीं है, यह सब धर्मों को आदर देने वाली धरती है हम कल्पना करें कि जिस सभा में राम, जीसस, नानक, यीशु, हजरत, गौतम बुद्ध बैठे हो तो वह सभा एक महीने तक भी शांतिपूर्वक चल सकती है लेकिन आज उन्हीं को मानने वाले उनके अनुयायियों को बिठाकर एक सभा की जाए तो एक दिन भी चलना मुश्किल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों?

आज बंदूक से बदलाव नहीं आएगा, बदलाव तो हम नारों के सहारे ही ला सकते हैं। यह पीढ़ी ही जात- पात के बंधन तोड़कर समाजिक समरसता को आगे बढा सकती है। इस अवसर पर राÓय निदेशक त्रिलोकीनाथ मिश्रा, डॉ. सुरेंद्र शुक्ला, राहुल सिंह परिहार उपस्थित रहे।


विश्व में भारत जैसा विविधता बहुल देश कहीं नहीं है, यह सब धर्मों को आदर देने वाली धरती है हम कल्पना करें कि जिस सभा में राम, जीसस, नानक, यीशु, हजरत, गौतम बुद्ध बैठे हो तो वह सभा एक महीने तक भी शांतिपूर्वक चल सकती है लेकिन आज उन्हीं को मानने वाले उनके अनुयायियों को बिठाकर एक सभा की जाए तो एक दिन भी चलना मुश्किल हो जाता है, आखिर ऐसा क्यों?

आज बंदूक से बदलाव नहीं आएगा, बदलाव तो हम नारों के सहारे ही ला सकते हैं। यह पीढ़ी ही जात- पात के बंधन तोड़कर समाजिक समरसता को आगे बढा सकती है। इस अवसर पर राÓय निदेशक त्रिलोकीनाथ मिश्रा, डॉ. सुरेंद्र शुक्ला, राहुल सिंह परिहार उपस्थित रहे।

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