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एक किस्सा: संजय और राजीव गांधी का वो दोस्त जिसने एक हादसे के बाद मंत्री का पद छोड़ दिया था

संजय गांधी के निधन से पहले इन दोनों नताओं के बीच तय हुआ था वक्त।

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भोपाल

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Pawan Tiwari

Oct 01, 2019

एक किस्सा: संजय और राजीव गांधी का वो दोस्त जिसने एक हादसे के बाद मंत्री का पद छोड़ दिया था

एक किस्सा: संजय और राजीव गांधी का वो दोस्त जिसने एक हादसे के बाद मंत्री का पद छोड़ दिया था

भोपाल. आपको मैं दो लाइनें सुनाता हूं। पहली है वो नेता जिसे सिर्फ मौत हरा पाई, कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं और दूसरी है झोपड़ियों का हितचिंतक था, भले महल का वासी था। तन से राजकुमार सलोना, मन से पर संन्यासी था। ये एक कवि की रचना है पर काल्पनिक नहीं। ये कविता एक ऐसे राजनेता के लिए लिखी गई थी जो आज हमारे बीच नहीं है पर हर सियासतदान की आंखों में उसके लिए सम्मान है। तारीख थी 22 जून, 1980। वक्त था शाम का। जगह थी प्रधानमंत्री का घर। संजय गांधी कमरे में प्रवेश करते हैं वहां पीएम इंदिरा गांधी के साथ एक नेता बैठा था। नाम था माधव राव सिंधिया। संजय गांधी कहते हैं। कल सुबह यानी 23 जून, 1980 को आपको मेरे साथ 'पिट्स-स' विमान में बैठकर दिल्ली की सैर करना है। दोनों नेताओं के बीच सुबह का वक्त तय होता है।


हादसे में हो गई थी संजय गांधी की मौत
23, जून 1980 संजय गांधी तय वक्त पर सफदरगंज एयरपोर्ट पहुंचते हैं। पर माधवराव सिंधिया पहुंचने में लेट हो जाते हैं। संजय गांधी ने सफदरगंज एयरपोर्ट से सुभाष सक्सेना नाम के पायलट के साथ उड़ान भरते हैं। थोड़ी देर बाद एयरक्राफ्ट क्रैश हो जाता है। संजय गांधी और पायलट की मौके पर ही मौत हो जाती है। मैं अपको ये किस्सा इसलिए सुना रहा हूं क्योंकि 1980 में एक बार मौत को चकमा देने वाले माधवराम सिंधिया की मौत 21 साल बाद संजय गांधी की तरह प्लेन क्रैश में ही हुई थी। वो तारीख थी 30, सितंबर 2001।


हादसे के 21 साल बाद हुई थी मौत
यूपी का मैनपुरी जिला यूं तो सियासत के लिए हमेशा सुर्खियों में रहा है। मैनपुरी जिले का एक गांव है भैंसरोली। 30 सितंबर को इस गांव में एक एयरक्राप्ट नीचे गिरता है। बारिश के बाद भी एयरक्रॉप्ट में लगी आग नहीं बुझती। ग्रामीण कीचड़ से आग बुझाने की कोशिश करते हैं। एयरक्राफ्ट में फंसे लोगों को निकालने का प्रयास किया तो एक भी आदमी जिंदा नहीं निकला। मरने वालों में माधवराव सिंधिया भी थे, लेकिन शव की पहचान करना मुश्किल था। माधव राव सिंधिया की पहचान उनकी राजशाही लॉकेट से हुई थी। ये हादसा तब हुआ था जब माधव राव सिंधिया दिल्ली से कानपुर एक रैली को संबोधित करने स्पेशल एयरक्राफ्ट से जा रहे थे।

शोक पुस्तिका में लिखा गया था संन्यासी
सिंधिया के तत्कालीन सचिव रहे रमेश शर्मा के अनुसार, नबंबर 1995 में मध्यप्रदेश में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। वक्त था रात के 12 बजे का। माधवराव सिंधिया अशोक नगर से ईसागढ़ जा रहे थे। उस समय एक बुजुर्ग पेड़ के नीचे खड़ा ठिठुर रहा था। यह देखकर माधवराव सिंधिया ने अपनी गाड़ी रुकवायी और उस बुजुर्ग के पास गए। उन्होंने उस बुजुर्ग से पूछा- आप इतनी रात को इस सुमसान सड़क पर क्यों खड़े हैं कोई परेशानी तो नहीं है हो तो बताइए। माधवराव सिंधिया की बात सुनकर उस बुजुर्ग ने कहा- मेरे महाराज यहां से निकलने वाले हैं और मुझे उनके दर्शन करने हैं। तभी रमेश शर्मा ने बुजुर्ग से कहा- यही आपके महाराज हैं। यह सुनकर बुजुर्ग माधवराव सिंधिया की तरफ बढ़ा तो माधवराव सिंधिया ने उस बुजुर्ग को गले लगा लिया और अपनी कीमती शॉल उस बजुर्ग को ओढ़ा दी। माधवराव ने उस बुजुर्ग से कहा- ठंड बहुत है उससे बचना।

फिर नहीं ओढ़ी शॉल
इसके बाद माधवराव सिंधिया चंदेरी पहुंचे। यहां वो चंदेरी गेस्ट हाउस में रूके थे। यहां पर उन्हें एक शॉल गिफ्ट की गई लेकिन उन्होंने तीन दिनों तक उस शॉल को नहीं ओढ़ा। तब रमेश शर्मा ने कहा- आप शॉल क्यों नहीं ओढ़ते हैं तो माधव राव सिंधिया ने जबाव दिया था। जब भी शॉल उठाता हूं उस गरीब बजुर्ग का चेहरा दिखाई देता है इसलिए शॉल नहीं ओढ़ता हूं। माधवराव सिंधिया के निधन के बाद शोक पुस्तिका में एक कवि ने लिखा था- झोपड़ियों का हितचिंतक था, भले महल का वासी था। तन से राजकुमार सलोना, मन से पर संन्यासी था।

राजमाता के इकलौते बेटे थे माधवराव सिंधिया
माधवराव सिंधिया ग्वालियर रियासत की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के बेटे थे। माधवराव सिंधिया कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ और सबसे तेज तर्रार नेताओं में शुमार किए जाते थे। माधवराव सिंधिया की मौत पर ग्वालियर बंद था तो सियासत का हर चेहरा रोया था। वजह थी माधवराव सिंधिया की छवि। ऐसा नहीं कि कांग्रेस का ये कद्दावर नेता सिर्फ कांग्रेसी थे। माधवराव सिंधिया जनसंघ के नेता भी थे और बागी भी थे। माधवराव सिंधिया ने राजनीति की शुरुआत जनसंघ से की थी तो अंत कांग्रेस में हुआ। माधव राव सिंधिया की मां विजया राजे सिंधिया भी पहले कांग्रेस में ही थी। लेकिन 1969 में जब इंदिरा सरकार ने प्रिंसली स्टेट्स की सारी सुविधाएं छीन लीं तो नाराज होकर विजया राजे सिंधिया जनसंघ में आ गईं। विदेश से पढ़ाई कर वापस लौटे माधव राव सिंधिया को भी उन्होंने जनसंघ की सदस्यता दिला दी। 1971 के चुनाव में जब देश में चारों तरफ इंदिरा गांधी की लहर थी तब 26 साल की उम्र में गुना संसदीय सीट से पहली बार चुनाव जीत कर माधव राव सिंधिया संसद पहुंचे। ये माधवराव सिंधिया की पहली जीत थी।

अजेय रहे माधव राव सिंधिया
इस जीत के बाद माधव राव सिंधिया ने पार्टी तो बदली पर उन्हें कोई राजनेता हारा नहीं सका। 1971 से 2001 तक माधव राव सिंधिया अजेय रहे। 1971 के बाद जब अगला चुनाव 1977 में इमरजेंसी के बाद हुआ तब माधव राव सिंधिया गुना संसदीय सीट से दोबारा चुनाव जीते पर इस बार को किसी पार्टी के उम्मीदवार नहीं थे वो स्वतंत्र उम्मीदवार थे। 1980 के चुनाव तक उनका झुकाव कांग्रेस की तरफ हो चुका था। 1980 का चुनाव भी वो निर्दलीय लड़े पर कांग्रेस ने उनका समर्थन किया। 1984 का चुनाव हुआ जिसमें माधव राव सिंधिया ने उस नेता को हराया जिसे भारतीय राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर ग्वालियर से चुनाव लड़ रहे थे तो माधव राव सिंधिया को कांग्रेस ने अंतिम क्षणों में अपना टिकट थमाकर मैदान में उतार दिया था। इस हार के बाद अटल बिहारी ने एक बात कही थी जो आज भी सियासत में एक पहेली है। 2005 में जब अटल बिहारी ग्वालियर आए थे तब उन्होंने साहित्य सभा में खुद कहा था कि मैं जानता था चुनाव हार जाऊंगा फिर भी में लड़ा था क्योंकि ग्वालियर में मेरी एक हार पर इतिहास छिपा हुआ है।

बगावत भी की थी
1996 में कांग्रेस से नाराज तीन बड़े नेताओं- नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया ने पार्टी छोड़ दी थी। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने तिवारी कांग्रेस के टिकट पर सतना लोकसभा सीट से पर्चा भरा। जबकि सिंधिया ने मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस पार्टी बनाई और चुनाव मैदान में उतरे। अर्जुन सिंह 1996 का चुनाव बसपा उम्मीदवार से हार गए पर माधव राव सिंधिया ने अपनी सीट आसानी से जीत ली थी। कई जानकार कहते हैं कि क्या प्रदेश कांग्रेस में आज कोई ऐसा नेता है जो इस तरह का करिश्माई नेता हो।

आज भी खलती ही माधवराव सिंधिया की कमी
माधव राव सिंधिया की कमी आज भी सियासत में खलती है। जब केंद्र में 1991 में पीवी नरसिंम्हा राव की सरकार बनी तो सिंधिया को नागरिक उड्‌डयन मंत्री बनाया गया लेकिन साल भर बाद ही एक रूसी विमान के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। जबकि इस घटना में एक भी जनहानि नहीं हुई थी। जानकार कहते हैं कि ऐसी नैतिकता आज कहां मिलती है। माधव राव सिंधिया ने मध्यप्रदेश के विकास के बारे में सोचा था। प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में रेल मंत्री थे तो भोपाल को रेल कोच फैक्ट्री दिलवाई थी और दिल्ली-भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस भी माधवराव सिंधिया की देन है।