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आईआईटी में था इंग्लिश का खौफ, हिंदी भाषी साथियों की परेशानी देख तैयार किया हिंदी ऐप

हिंदी को बढ़ावा देने तीन आईआईटीयन ने तैयार किया 'पंक्ति' ऐप

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भोपाल। हमने 2014 में आईआईटी कानपुर में एडमिशन लिया। वहां देश के अलग-अलग प्रांतों से विभिन्न भाषा बोलने वाले स्टूडेंट्स थे, इनमें बस ही भाषा कॉमन थी वो थी इंग्लिश। हमने देखा कि लोग मातृभाषा में अपने विचार ज्यादा बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन आईआईटी, कानपुर में इंग्लिश ही मंचीय भाषा थी जिसकी वजह से हिंदी भाषी लोग ख़ुद को अभिव्यक्त नहीं कर पाते थे। फोर्थ ईयर में हमने सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर 'हिंदी पंक्तियां' नाम से पेज बनाया, इसका मकसद हिंदी भाषा और हिंदी भाषा में लेखन करने वालों को बढ़ावा देना था। धीरे-धीरे ये फेस पसंद किया जाने लगा तो हमने इसे स्टार्टअप का रूप दे दिया। यह कहना है दीपक जौरवाल का। जो अपने दो साथी राजकुमार और अभिषेक मेहरा के साथ 'पंक्ति' ऐप के माध्यम से लोगों को अपनी भावनाएं अपनी भाषा में व्यक्त करने का मौका दे रहे हैं।

हमारी जो भी बचत होती, हम ऐप डेवलप करने पर खर्च करने लगे

दीपक ने बताया कि हम तीनों साथी राजस्थान के रहने वाले हैं। आईआईटी में एडमिशन के बाद तीनों की दोस्ती हो गई। हम इंग्लिश तो जानते थे, लेकिन मातृभाषा हिंदी में ज्यादा सहज महसूस करते थे। वहां पढ़ने वाले अन्य साथी इंग्लिश में ही बात करते थे। 22018 से 2020 के बीच, जब धीरे-धीरे लिखने और पढ़ने वाले इस पेज को पसंद करने लगे तो लगा कि अब हम इसे तकनीक की मदद से ज्यादा बेहतर बना सकते हैं। 2021 में हमने एक ऐप्लिकेशन लॉन्च किया। हमने एक ऐप्लिकेशन बनाने का निर्णय लिया। मेरे दोनों साथी प्लेसमेंट के बाद जॉब करने लगे और मैं यूपीएससी की तैयारी करने लगा। हमारी जो भी बचत होती, हम ऐप डेवलप करने पर खर्च करने लगे। धीरे-धीरे इसके यूजर्स बढ़ने लगे तो हमें लगा कि हमें इसे समय देना चाहिए। हमने अपना काम छोड़कर फुल टाइम इसे ही देना शुरू कर दिया।

करोड़ों लोग अपनी भावनाएं अभिव्यक्त ही नहीं कर पाते

दीपक का कहना है कि अभी हम गुडगांव से काम कर रहे हैं। करीब एक साल पहले लॉन्च किए गए इस ऐप से करीब चालीस हजार लोग जुड़ चुके हैं। महिलाएं और ग्रामीण परिवेश में रहने वाले करोड़ों लोग सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म से तो जुड़े हैं, लेकिन अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पाते। क्योंकि शायद ये उनके इस उपयोग के लिए बने भी नहीं है। हमारी कोशिश है कि हम ऐसे लोगों को ऐप से जोड़ सकें, जहां उनकी जैसे लोगों की ही कम्युनिटी हो। वे खुलकर अपने विचार लिख सकें और दूसरों के विचारों पर अपनी राय रख सकें। अभिषेक और राजकुमार ने बताया कि हम तीनों ने जब इस ऐप पर काम करने का फैसला किया तो परिवार वाले इसके समर्थन में नहीं थे, क्योंकि हर किसी को लगता है कि उनका बच्चा आईआईटी करने के बाद बड़े पैकेज की नौकरी कर सकता है तो एक ऐसे ऐप के लिए क्यों समय बर्बाद करना जिसके भविष्य की संभावनाओं का पता नहीं। जब उन्होंने लोगों को रुझान को देखा तो अब वे भी हमारे फैसले का समर्थन करने लगे हैं।