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यूरोपीय वैज्ञानिकों को मजबूर होकर पढऩे पड़े थे वेदांत – प्रो. रामनाथ झा

सांची विश्वविद्यालय में 5 दिवसीय कार्यशाला, क्वांटम फिजिक्स और अनिश्चित्ता के सिद्धांत पर चर्चा

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यूरोपीय वैज्ञानिकों को मजबूर होकर पढऩे पड़े थे वेदांत - प्रो. रामनाथ झा

भोपाल। सांची बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के बारला अकादमिक परिसर में पांच दिवसीय कार्यशाला मंगलवार से शुरू हुई। इसमें आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय दर्शन का लेखन और वेदांत और भौतिकी विषय पर चर्चा की गई।

क्वांटम फिजिक्स पर दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के प्रो. रामनाथ झा ने वेदांत के सिद्धांतों और भौतिकी के प्रतिपादित सिद्धांतों के बीच तुलना कर बताया कि यूरोप और अमेरिका के बड़े-बड़े वैज्ञानिकों को मजबूर होकर वेदांतों का अध्ययन करना पड़ा।

उनका कहना था कि जब वेदांतों के अनुवाद मैक्स म्यूलर और अन्य दार्शनिकों के माध्यम से यूरोप पहुंचे तो नील बोहर, श्रोडिंगर, हाइजनिबर्ग और व्हीलर जैसे भौतिक विज्ञानियों को उपनिषद के अनुवाद पढऩे पड़े। इन वैज्ञानिकों के मन-मष्तिष्क में उठ रहे सवालों का जवाब उन्हें उपनिषदों के अनुवाद से मिला और उन्होंने और अधिक इन वेदांतों का अध्ययन किया। हाइजनिबर्ग ने अनिश्चित्ता का सिद्धांत दिया था और इस सिद्धांत को लेकर उनकी अलबर्ट आइंसटीन से काफी बहस भी हुआ करती थी। अनिश्चित्ता के सिद्धांत को वेदांत दर्शन में प्राथमिकता से उल्लेखित किया गया है।

भारतीय दर्शन में चेतना को दिया गया स्थान

प्रथम सत्र के दूसरे वक्ता के रूप में प्रो. एमके श्रीधर ने भारतीय दर्शन में चेतना और आधुनिक विज्ञान विषय पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि यूरोप के वैज्ञानिकों ने हमेशा से ही चेतना(आत्मा) को नकारा है। आइंसटीन ने हमेशा न्यूटन के सिद्धांतों का समर्थन किया और हाइजनिबर्ग और नील बोहर के साथ उनके वैचारिक मतभेद रहे। प्रो. श्रीधर का कहना था कि भारतीय दर्शन में प्रारंभ से ही चेतना को स्थान दिया गया था और बहुत से ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आज भी वैज्ञानिक नहीं दे पा रहे हैं। प्रो. श्रीधर का कहना था कि यूरोपीय वैज्ञानिक श्रोडिंगर ने भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन करने के बाद कहा था कि भारतीय दर्शन में बेहद सूक्ष्मता और विचित्रता है यानि इसमें स्वतंत्र चिंतन मौजूद है।

वहीं, दूसरे सत्र में धर्मशास्त्र के मीमांसा और पुरुषार्थ में आचार-विचार पर चर्चा की गई। कोलकाता विश्वविद्यालय के प्रो. दिलीप कुमार मोहंता ने महाभारत में नैतिकता एवं स्थितिक सत्यता पर चर्चा की। उन्होंने महाभारत में वर्णित छोटी-छोटी कहानियों के माध्यम से बताया कि कैसे एक समय में धर्म कही जाने वाली स्थिति को दूसरे समय अपधर्म कहा जा सकता है।