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खेती में हल चलाने वाले किसानों ने पेश की भीमा नायक की दास्तां

शहीद भवन में नाटक 'सुरसी का लाल' का मंचन

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खेती में हल चलाने वाले किसानों ने पेश की भीमा नायक की दास्तां

भोपाल। शहीद भवन में आदि महोत्सव के अंतिम दिन रविवार को टीकमगढ़ से आए कलाकारों ने नाटक सुरसी का लाल का मंचन किया। इस नाटक का निर्देशन संजय श्रीवास्तव ने किया है। एक घंटे पंद्रह मिनट के इस नाटक में भीमा व उनकी मां के संघर्ष व योगदान को दर्शाया गया है। नाटक का यह पहला शो था। नाटक में सभी कलाकार खेती किसानी करते हैं। समय निकालकर नाटक की तैयारी करते हैं। नाटक में युद्ध के सीन के लिए स्टेज पर ही जंगल का दृश्य बनाया गया। इसमें पेड़, पौधे को लगाया है। नाटक में रिकॉर्डेड म्यूजिक का यूज किया गया है। नाटक निमाड़ अंचल के वीर योद्धा भीमा नायक पर केन्द्रित है।

नाटक की शुरुआत मवई गांव के भीमानायक से होती है, जहां साहूकार गांव के लोगों पर अत्याचार करता है, इसी बीच मवई पर अंग्रेजी सरकार भी लोगों पर शोषण करने लगती है। इसी बीच भीमनायक के पिता रामा को लूट-पाट और हथियार बनाने के जुर्म में हत्या कर देते है। इस दुर्घटना से भी बुरी तरह टूट जाता है, इसी बीच मालवा राज्य के सिपाही दौलत से मुलाकात होती है और वह अंग्रेजों के खिलाफ गांव के लोगों को एकत्रित करता है। गांव वालों को युद्ध के लिए प्रशिक्षण देता है। वहीं अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई जारी कर देता है। इस लड़ाई में उसकी मां सुरसी व अन्य साथी को पकड़कर मंडलेश्वर जेल में बंदी बनाकर मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताडि़त करते है। लेकिन सुरसी तमाम परेशानियों को सहन करने के बाद भी भीम का पता नहीं बताती, और अपना दम तोड़ देती है।
सादिया बताता है भीमा का पता

वहीं अगली कड़ी में दिखाया कि अंग्रेजों का एक भी गुप्तचर सादिया होता है, वह भीमा को अपने घर में पनाह देता है और इनकी सूचना अंग्रेज अधिकारियों को दे देता है। सूचना पाते ही अंग्रेज फौज के सिपाही उसे पकड़ लेते है और उस पर मुकदमा चलाकर काले पानी की सजा सुनाते है, जहां उसकी मृत्यु हो जाती है।