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पुलिस में देसी श्वान- 20 की ट्रेनिंग पूरी, जानें इनके फायदे

- जल्द ही प्रदेश के अलग अलग जिलों में होगी पोस्टिंग- पहली बार मध्यप्रदेश पुलिस में शामिल होंगे देसी नस्ल के श्वान

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भोपाल। मध्यप्रदेश पुलिस पहली बार देसी नस्ल के डॉग्स को अपने श्वानदस्ते में शामिल करने जा रही है। इसके लिए पहले बैच की ट्रेनिंग पूरी हो चुकी है। इस बैच में 19 देसी और एक एक विदेशी नस्ल का श्वान है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से लाए गए सभी डॉग्स ट्रेनिंग में खरे उतरे हैं। मध्यप्रदेश पुलिस पहली बार देसी नस्ल के डॉग्स के साथ काम करने जा रही है। सभी कुत्तों की परीक्षा हो चुकी है। 15 दिनों में इनकी प्रदेश के अलग-अलग जिलों में पोस्टिंग होगी।

विदेशी श्वान की तुलना में कीमत में कई गुना सस्ते
डॉग ट्रैनर्स के मुताबिक देसी नस्ल के कुत्तों के साथ काम करना ज्यादा बेहतर है। ये भारत के वातावरण से परिचित रहते हैं तो जल्दी ढल जाते हैं और बीमार नहीं पड़ते हैं। ये कुत्ते फुर्तीले हैं। कीमत और खर्चे में भी देसी ब्रीड विदेशी ब्रीड से कई गुना सस्ते हैं।

इस बैच में लाए गए कुत्तो में सबसे मंहगा मुधौल ब्रीड है जो 15 हजार का है। वहीं सबसे सस्ता कोंबई है जो मात्र तीन हजार तक आता है। इनका एक महीने का खर्चा लगभग 8 से 10 हजार का है। जबकि इसी बैच में शामिल एक विदेशी कुत्ते, गोल्डन रिट्रीवर की कीमत 80 हजार है और खर्चा भी ज्यादा है।

10 साल तक देनी होगी सर्विस-
ट्रैनिंग के लिए 6 ब्रीड्स के 20 कुत्ते लाए गए थे। इनमें से 19 ने ट्रेनिंग पूरी कर ली है। एक को ट्रैंनिग के दौरान रिजेक्ट कर दिया गया। इसके तमिलनाडू से राजा पलायन, कोंबई, कन्नी, चीपीपराई ब्रीड, कर्नाटक से मुधौल, और उत्तरप्रदेश से रामपुर ब्रीड के डॉग्स को इसमें शामिल किया गया है।

जानकारों के मुताबिक ये स्पेशल ब्रीड्स राजाओं ने अलग-अलग बेस्ट ब्रीड की मेटिंग करवाकर अपने शिकार के लिए बनवाई थी जिन्हें अब पुलिस में शामिल किया जा रहा है।

ट्रैनिंग के लिए 4 से 6 महीनों के पिल्लों को लाया गया था। जब ये 6 महीने के हुए तो इनकी ट्रैनिंग शुरू हुई थी। अब सभी को कम से कम 10 साल सर्विस देनी होगी, उसके बाद ये रिटायर होंगे।

चार हिस्सों में पूरा हुआ 9 महीने का प्रशिक्षण
पुलिस में शामिल करने के लिए सभी को 9 महीनों का प्रशिक्षण दिया गया। पहले महीने ‘हाउस मैनर्स’ की ट्रेनिंग हुई। इसमें ट्रैनर ने डॉग से बॉन्डिंग करी। उन्हें खिलाने-पिलाने से लेकर साफ-सफाई सब ट्रैनर करते हैं जिससे उनके बीच बॉन्ड बन सकें। इसके बाद अगले तीन महीने द्मआज्ञाकारी प्रशिक्षणद्य हुआ। इसमें उन्हें ऑडर्स फॉलो करने की ट्रैनिग दी गई।

पांचवे महीने उनकी सेंट कंडिशनिंग की गई जिससे वे गंध पहचान सके। इसके बाद अगले तीन महीने सेंट वर्क ट्रेनिंग हुई जिसमें उन्हें एक्सप्लोसिव, ट्रैकर और नारकोटिक्स की पहचान करना सिखाया जाता है। आखिरी महीने में हर तरह की एक्सरसाइज करवाई गई। सभी कुत्तों का 400 नंबर का एग्जाम हुआ जिसमें सात अलग-अलग टेस्ट हुए।

प्रदेश में पहली बार देसी श्वानों को ट्रेनिंग दी गई है जिसमें सभी ने बेहतर प्रदशर्न किया है। अब कुछ दिनों में सभी की पोस्टिंग हो जाएगी। हमें पूरी उम्मीद है कि फील्ड पर्फारमेंस में भी ये अच्छा रिजल्ट देंगे। इससे देसी नस्ल को बढ़ावा मिलेगा जो कि कई तरह से अच्छा है।
- नीरज ठाकुर, उप पुलिस अधीक्षक, 23 वी वाहिनी, विसबल, भोपाल

ट्रेनिंग के दौरान रूटीन-
: सुबह 6 बजे कमरों से बाहर निकाले जाते हैं
: 06:30 बजे से 10:30 बजे तक ट्रेनिंग
: 10:30 - खाना

ब्रेक-
03:00 से 06:00 बजे तक ट्रेनिंग

खाने का रूटीन-
सुबह - दुध, रोटी
शाम - मटन रोटी

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