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चार साल से कर रहे पढ़ाई फिर भी फर्स्ट ईयर में, 40 हजार छात्रों को अब मप्र छोड़ दूसरे राज्यों से करना होगी नर्सिंग की पढ़ाई

मध्यप्रदेश में हुए नर्सिंग कॉलेज घोटाले की सीबीआइ जांच चल रही है। इस साल एडमिशन नहीं हो पाए हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाई के लिए अब एक साल का इंतजार का इंतजार करना होगा। परीक्षा ना होने से छात्रों की शासन ने स्कॉलरशिप भी बंद कर दी है, ऐसे में जब से कॉलेज फीस जमा करना पड़ रही है।

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नर्सिंग कॉलेज घोटाले ने प्रदेश के 80 हजार से ज्यादा विद्यार्थियों को अंधकारमय बना दिया। विद्यार्थियों ने इस उम्मीद में सरकारी-प्राइवेट नर्सिंग कॉलेजों में एडमिशन लिया और चार साल बाद नौकरी का सपना पाल बैठे। सरकार में बैठे अधिकारियों ने अपनी जेब भरने के लिए कुछ निजी नर्सिंग कॉलेज संचालकों से सांठगांठ कर अपात्र कॉलेजों को मान्यता दे दी। मान्यता के इस खेल की अब सीबीआइ जांच कर रहा है। हाल ही सीबीआइ ने हाईकोर्ट से जांच पूरी करने के लिए तीन माह की मोहलत मांगी है। ऐसे में अब इस साल कॉलेजों में एडमिशन नहीं हो पाएंगे। गरीब छात्रों का एक साल बर्बाद हो गया, अब उन्हें एडमिशन के लिए अगले साल का इंतजार करना होगा।

हाईकोर्ट की सख्ती, मांग की खारिज

चिकित्सा शिक्षा विभाग ने हाईकोर्ट में आवेदन दिया था कि विद्यार्थियों के भविष्य को देखते हुए परीक्षा परिणाम जारी करने और एडमिशन प्रक्रिया के लिए पोर्टल शुरू करने अपील की थी। हाईकोर्ट से केस की गंभीरता को देखते हुए इसे सिरे से खारिज कर दिया। सीबीआइ ने कॉलेजों की जांच के लिए तीन माह का ओर समय मांगा। गौरतलब है कि जांच में अब तक 93 कॉलेज दोषी पाए जा चुके हैं।

30 हजार स्टूडेंट्स का रिजल्ट रूका

नर्सिंग कॉलेज घोटाले के चलते प्रदेश के करीब 30 हजार विद्यार्थियों का रिजल्ट रूका हुआ है। मप्र आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, जबलपुर ने सत्र को जीरो ईयर घोषित कर दिया। इधर, सरकार ने चुनाव को देखते हुए सत्र 2023-24 को शून्य करने को लेकर अंतिम निर्णय ही नहीं लिया। सत्र शून्य करने का प्रभाव केवल निजी कॉलेजों पर ही नहीं, बल्कि सरकारी नर्सिंग कॉलेजों पर भी होगा। यदि शासन सत्र शून्य करने के प्रस्ताव को अमान्य करता है तो विवि को कम से कम छह माह संबद्धता देने की प्रक्रिया में लगेंगे।

सरकारी कॉलेजों तक में सुविधा नहीं
प्रदेश में निजी ही नहीं सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भी पूरी व्यवस्थाएं नहीं है। चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों के अनुसार अब तक जांच में 8 सरकारी कॉलेजों में नियमों के अनुसार फैकल्टी व अन्य व्यवस्थाएं नहीं पाई गई है। अन्य कॉलेजों में भी यही स्थिति है। प्रदेश में 25 सरकारी मेडिकल कॉलेज और 2 केंद्र सरकार के कॉलेज हैं।

20 हजार स्कॉलरशिप बच्चे अब जेब से भर रहे फीस
सत्र-2020-21, 21-22 और 2022-23 बैच में विद्यार्थी परेशान हैं।
कहने को तो 2020-21 बैच का विद्यार्थी फोर्थ ईयर की पढ़ाई कर रहा है, लेकिन आज भी वह फर्स्ट ईयर पास नहीं है। छात्रों का कहना है कि उन्हें बीएससी की डिग्री लेने में ही सात से आठ साल का समय लगेगा तो एमएमसी और पोस्ट बेसिक नर्सिंग की दो साल की डिग्री भी चार साल में पूरी नहीं हो पाई है। प्रदेश में हर साल करीब 20 हजार छात्र स्कॉलरशिप लेकर पढ़ाई करते थे। परीक्षा नहीं होने से अब उन्हें सरकार से स्कॉलरशिप मिलना भी बंद हो गई। कोर्स पूरी करने के लिए उन्हें जेब से फीस देना पड़ रही है।

अब तक जांच ही पूरी नहीं हुई
नर्सिंग प्रोफेशन डेवलपमेंट वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. प्रणीत जैन का कहना है कि निजी कॉलेजों में करीब 70 हजार रुपए फीस है। हर साल राज्य में करीब 40 हजार विद्यार्थी एडमिशन लेते थे। एडमिशन प्रकि्रया ना होने से इनमें से 20 से 30 हजार को अन्य राज्यों में एडमिशन लेना पड़ा है। कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों को स्कॉलरशिप मिलना भी बंद हो चुकी है। डेढ़ साल से जांच ही पूरी नहीं हो पाई है।

किसी को आज तक सजा नहीं हुई
नर्सिंग छात्र संगठन के अध्यक्ष गोपाल पाराशर का कहना है कि अधिकारियों ने घोटाला कर करीब 80 हजार बच्चों का भविष्य बर्बाद कर दिया। लाखों रुपए फीस चुकाकर पढ़ाई कर रहे हैं, लेकिन कागजों में आज भी 12वीं पास ही है। अगले साल पेपर होंगे तो भी चार साल की डिग्री सात से आठ साल में पूरी होगी। घोटाला करने वाले एक भी अधिकारी को आज तक जेल नहीं हुई।