
डॉ. दीपेश अवस्थी
चुनावों में युवाओं की बात होती है, युवाओं से बड़े-बड़े वादे भी होते हैं, पर वादे कितने पूरे होते हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य में बेरोजगारों की संख्या में दिनों-दिन इजाफ हो रहा है। मध्यप्रदेश में बेरोजगारों की संख्या बढ़कर 41 लाख के पार जा पहुंची है। चिंतनीय है कि इस संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। दिनों-दिन बढ़ रही बेरोजगारों की संख्या बड़ी समस्या भी है। मध्यप्रदेश के विभिन्न विभागों में दो लाख पद रिक्त हैं। रिक्त पदों पर भर्ती न होने से जहां एक ओर सरकारी विभागों में काम का बोझ बढ़ा है, वहीं बेरोजगारों की संख्या भी बढ़ रही है।
राज्य में वर्ष 1998 से 2003 तक दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री रहे। इनके मुख्यमंत्रित्व काल में हुए निर्णयों से बेरोजगारों को सबसे बड़ा झटका लगा। सरकारी विभागों में 30 प्रतिशत पदों में कटौती का निर्णय लिया गया। निर्णयों के तहत अधिकारी-कर्मचारी रिटायर होते गए, रिटायर होने के साथ ज्यादातर पद भी समाप्त होते रहे। नई भर्तियां नहीं हुईं। वर्ष 2003 के बाद भाजपा सत्ता में आई। वर्ष 2003 से 2018 तक (तीन कार्यकाल) में भाजपा सत्ता में रही, पर युवाओं के लिए कोई ठोस प्रयास नजर नहीं आए। सरकारी विभागों में भर्तियां हुईं, इनमें भी घोटाले हुए। व्यापमं घोटाले के आरोपियों को सजा हुई।
वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई। कमलनाथ मुख्मयंत्री बने, वादा किया गया कि विभागों में रिक्त पदों पर भर्तियां होंगी। विभिन्न विभागों से जानकारी भी मंगवाई गई, पर भर्तियां होतीं इसके पहले ही कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई। डेढ़ साल बाद भाजपा सत्ता में फिर लौटी, वादा किया गया कि प्रतिवर्ष एक लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी, लेकिन एक लाख पद नहीं भरे जा सके।
बेरोजगारी बढ़ने से पलायन बढ़ा
राज्य में बेरोजगारी बढ़ने का असर शहरी सहित ग्रामीण क्षेत्रों में देखा जा सकता है। इससे अन्य राज्यों में रोजगार के लिए पलायन बढ़ रहा है। प्रदेश के बुंदेलखण्ड, विंध्य क्षेत्र में पलायन की समस्या सबसे अधिक है। विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर हेागा कि सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में ही रोजगार की व्यवस्था करे ताकि पलायन रुके। इससे शहरों में भी बोझ नहीं बढ़ेगा।
आर्थिक सर्वे में दावा
Updated on:
06 Dec 2023 01:03 pm
Published on:
06 Dec 2023 12:58 pm
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