
bor solar plant
अनिल चौधरी, भोपाल. हरित ऊर्जा पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए ज्यादा हानिकारक नहीं है। यह अक्षय ऊर्जा स्रोतों जैसे सूर्य, पवन, जल, भूगर्भ और पादपों से उत्पन्न की जाती है। देश-दुनिया की बढ़ती जनसंख्या के कारण ईंधन की लागत बढ़ रही है और इसके समानांतर परम्परागत ईंधन भंडारों में भी कमी होती जा रही है। ऐसे में सभी लोग ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत खोज रहे हैं। भविष्य की अपार संभावनाओं वाली ( green energy ) हरित ऊर्जा आवश्यकता बनती जा रही है। पिछले तीन दशकों में, हरित ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से अनुसंधान और विकास कार्य हुए हैं। नई हरित प्रौद्योगिकयां भी सामने आई हैं, कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस जैसे पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम करने के लिए काफी हैं। जीवाश्म ईंधन की तुलना में हरित ऊर्जा स्रोत बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं। गैर प्रदूषणकारी हरित ऊर्जा के कई विकल्पों अनुसंधान हुए हैं और चल भी रहे हैं।
- आदर्श विकल्प है सौर ऊर्जा
सीधे सूर्य से प्राप्त ऊर्जा ( green energy ) हरित ऊर्जा का सर्वाधिक प्रचलित विकल्प है। पिछले कई वर्षों से ( solar energy ) सौर उर्जा का प्रयोग किया जा रहा है। सौर ऊर्जा बड़े पैमाने पर बिजली भी बनाई जा रही है। लोग प्राकृतिक प्रकाश के तौर पर तो इसका इस्तेमाल करते ही हैं, साथ ही आजकल सोलर गीजरों और सोलर कुकरों का प्रयोग भी घरों में बहुत बढ़ता जा रहा है। इन सबके लिए सौर ऊर्जा को एकीकृत फोटोवोल्टाइक एवं ऊर्जा संयंत्र के निर्माण के रूप में उपयोग किया जाता है। दुनिया के प्रमुख फोटोवोल्टाइक पावर संयंत्रों में नेलिस सौर ऊर्जा संयंत्र, गीरासोल ( electricity ) सौर ऊर्जा विद्युत संयंत्र तथा वाल्डपोलेंज सौर उद्यान शामिल हैं। भारत की सघन जनसंख्या और उच्च सौर आतपन के कारण यहां सौर ऊर्जा एक आदर्श ऊर्जा स्रोत बन सकती है। भारत अब दुनिया के दस शीर्ष सौर ऊर्जा उत्पादक देशों में शुमार है। इसके लिए विदेशी कंपनियां भी अब भारत की ओर आकर्षित हो रही हैं।
- हवा से बिजली बनाने में भारत चौथे नंबर पर
धरती के खुले हवादार स्थानों पर पवन चक्कियों से हवा के माध्यम से बनने वाली पवन ऊर्जा भी हरित ऊर्जा का अच्छा विकल्प है। इससे भी बिजली बनाई जाती है। मध्यप्रदेश में देवास के पास इस पर वर्षों से काम हो रहा है। वहीं, राजस्थान के सीकर जिले में भी पवन ऊर्जा का इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा माना जाता है कि दुनिया में सकल पवन ऊर्जा के उपयोग में चीन, अमरीका और जर्मनी के बाद भारत का चौथा स्थान है। भारत की पवन ऊर्जा के उत्पादन में कुल वैश्विक भागीदारी 5.8 प्रतिशत है। भारत सरकार ने 1998 में चैन्नई एक स्वायत्त अनुसंधान और विकास संस्थान पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी केन्द्र (सी-वैट) की स्थापना की थी। यह संस्थान देश में संपूर्ण पवन ऊर्जा क्षेत्र में सेवा प्रदान करता है। भावी अनुसंधान द्वारा सभी प्रकार की कठिनाइयों के समाधान निकालने और सुधार लाने का प्रयास करता है। इस केंद्र का क्याथार में एक पवन टरबाइन परीक्षण केन्द्र (डब्ल्यूटीटीएस) है, जो डेनमार्क की तकनीकी तथा आंशिक रूप से वित्तीय सहायता से स्थापित किया गया है। यह केंद्र देश में पवन विद्युत के विकास, पवन ऊर्जा के उपयोग की गति को बढ़ावा देने और पवन विद्युत क्षेत्र में तकनीकी विकास के लिए कार्य कर रहा है। समुद्र में भी इसका उपयोग हो रहा है। इसके लिए राष्ट्रीय ऑफशोर पवन ऊर्जा नीति के तहत पवन ऊर्जा के प्लांट ऑफशोर यानी समुद्री सीमा से संलग्न 200 नॉटिकल्स मील के भीतर समुद्र में लगाए जाते हैं। पवन ऊर्जा को एक अतिविकसित, कम लागत वाला और प्रमाणित अक्षय ऊर्जा प्रौद्योगिकी के रूप में मान्यता प्राप्त है। तटवर्ती पवन ऊर्जा प्रौद्योगिकी व्यापक स्तर पर भारत में निरंतर वृद्धि के साथ क्रियान्वित हो रही है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2016-17 में पवन ऊर्जा में 5400 मेगावाट की वृद्धि हुई है। भारत में पवन ऊर्जा से विद्युत उत्पादन 10000 मेगावाट से अधिक है। भारत की संस्थापित पवन ऊर्जा क्षमता (25,088 मेगावाट) देश की कुल विद्युत संस्थापित क्षमता का 8.7 प्रतिशत है। भारत में आयातित कोयले से पैदा होने वाली बिजली के मुकाबले पवन ऊर्जा सस्ती पड़ती है।
- जल विद्युत में चीन और ब्राजील सबसे ऊपर
जल सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है। जल ऊर्जा ज्वार-भाटा, तरंगों, जलताप और जलविद्युत के रूप में मिलती है। जल ऊर्जा भी हरित ऊर्जा का एक प्रकार है। जल ऊर्जा अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा पैदा करने के लिए उच्च वर्षा के स्तर पर निर्भर करती है। विकसित देशों के विकास में जलविद्युत का योगदान आवश्यकता का 50 प्रतिशत से अधिक रहता है, जबकि भारत में यह 15 प्रतिशत के लगभग है। दुनिया के सर्वाधिक जलविद्युत उत्पादक देशों में चीन और ब्राजील सबसे ऊपर आते हैं। भारत में जलविद्युत पनबिजली के नाम से अधिक जानी जाती है। भारत की जलविद्युत परियोजनाओं में उत्तराखंड की भागीरथी नदी की लगभग 2400 मेगावाट की टिहरी परियोजना, महाराष्ट्र की कोयना नदी की लगभग 1956 मेगावाट की कोयना परियोजना, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में कृष्णा नदी की लगभग 1670 मेगावाट की श्रीशैलम परियोजना और हिमाचल प्रदेश में सतलज नदी की लगभग 1500 मेगावाट की नाथपा झाकड़ी परियोजना प्रमुख हैं। हिमाचल प्रदेश के मंडी में तीन जलविद्युत परियोजना कोलडैम जलविद्युत परियोजना, पार्वती जलविद्युत परियोजना और रामपुर जलविद्युत परियोजना हैं। इन परियोजनाओं की संयुक्त स्थापित क्षमता 1732 मेगावाट से अधिक है। भारत ने भूटान, मलेशिया, नेपाल, ताइवान एवं न्यूजीलैंड में भी जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित करने में भी मदद की है।
- 24 देशों में बन रही भू-तापीय ऊर्जा
पृथ्वी के गर्भ में उपस्थित खनिजों के रेडियोधर्मी क्षय और भू-सतह द्वारा अवशोषित सौर ऊर्जा के कारण भारी मात्रा में तापीय ऊर्जा बनती है, जिसे भू-तापीय ऊर्जा कहते हैं। इसमें मनुष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने की असीम क्षमता है, लेकिन इसके दोहन के उपाय बहुत महंगे हैं। सामान्य तौर पर भू-तापीय ऊर्जा का उपयोग भी उद्योगों व घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बिजली उत्पादन में ही किया जाता है। सबसे पहला भू-तापीय विद्युत केंद्र इटली में स्थापित किया गया था। वर्तमान में जापान, इंडोनेशिया, न्यूजीलैंड, इटली, मैक्सिको, फिलीपींस, चीन, रूस, टर्की सहित दुनिया के 24 देशों में भू-तापीय विद्युत पैदा कर रहे हैं। इसकी लगभग 78 देशों में आपूर्ति की जा रही है। भू-तापीय विद्युत आइसलैंड में उत्पन्न की जाती है। दुनियाभर में भू-तापीय संयंत्रों में 10 गीगावाट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता है। विश्व में भू-तापीय ऊर्जा संयंत्र का सबसे बड़ा समूह अमरीका के कैलिफोर्निया में है। कुछ देश जैसे अल साल्वाडोर, केन्या, फिलीपींस, आइसलैंड और कोस्टा रिका में विद्युत उत्पादन में 15 प्रतिशत से अधिक भू-तापीय स्रोतों का उपयोग होता है। पिछले कई दशकों से भारत में भी भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिक भूतापीय ऊर्जा के शोध व अध्ययन में लगे हुए हैं, जिसके तहत यहां लगभग 340 तापीय झरनों की पहचान की जा चुकी है। 2015 में यह निर्धारित हुआ कि छत्तीसगढ़ में बलरामपुर जिले के तातापानी में देश का पहला भूतापीय विद्युत केंद्र स्थापित होगा, तब से इस परियोजना के तहत कार्य जारी है।
- हरित ऊर्जा ये भी हैं विकल्प
बायोमास, जैव ईंधन और लैंडफिल गैस को भी हरित ऊर्जा के अन्तर्गत रखा गया है। ऐसा माना जा रहा है कि लकड़ी के बुरादे, कचरे और जलाए जा सकने योग्य कृषि अपशिष्ट पेट्रोलियम आधारित ईंधन स्रोतों की तुलना में बहुत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन करते हैं। अत: इनका उपयोग ऊर्जा स्रोत की तरह किया जा सकता है। ( madhya pradesh electricity ) इन सामग्रियों को बायोमास या जैवभार के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इनमें उपस्थित ऊर्जा सूर्य से संग्रहीत होती है। ऐसा भी देखा जाता है कि कभी-कभी यह बायोमास कार्बनिक सामग्री जलाए जाने के बजाय ईंधन में परिवर्तित करके भी इस्तेमाल किया जा सकता है। तब इसे जैव ईंधन की संज्ञा दी जाती है। इसके उल्लेखनीय उदाहरणों में इथेनॉल और बायोडीजल शामिल हैं। हरित ऊर्जा के उपर्युक्त विकल्पों और उनकी अक्षय व पुन: निर्मित क्षमताओं ने परम्परागत ऊर्जा स्रोतों से स्वयं को बेहतर साबित कहलाने के लिए बाध्य किया है। दुनिया जिन ऊर्जा स्रोतों को जीवाश्म ईंधन के रूप में उपयोग करती आ रही है, वे एक सीमित संसाधन है। जहां एक ओर उनके विकास में लाखों साल लग जाते हैं। वहीं, उनके अत्यधिक दोहन से समय के साथ-साथ वे कम होते जाएंगे। एक और सबसे बड़ी बात यह है कि हरित ऊर्जा विकल्पों का जीवाश्म ईंधन की तुलना में पर्यावरण पर बहुत कम दुष्प्रभाव पड़ता है, क्योंकि इनसे ग्रीन हाउस गैसें नहीं निकलती हैं। जीवाश्म ईंधन प्राप्त करने के लिए प्राय: पृथ्वी पर उन स्थानों में खनन अथवा ड्रिलिंग करने की आवश्यकता होती है जो पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील होते हैं। जीवाश्मीय ईंधनों, जैसे-तेल, गैस या नाभिक ईंधनों जैसे यूरेनियम आदि की तरह किसी भी देश या वाणिज्यिक प्रतिष्ठान का एकाधिकार नहीं होता है।
- उत्पादन शुरू करने का खर्च अधिक
हरित ऊर्जा विकल्पों की प्रौद्योगिकियों में निरंतर विकास हो रहा है। सौर पैनलों, पवन टर्बाइनों और हरित ऊर्जा के अन्य स्रोतों का उपयोग मुख्य रूप से बिजली का उत्पादन करने में किया जा रहा है। इन सभी विकल्पों में एक तथ्य इनका अधिक खर्चीला होना भी है, क्योंकि इनके उत्पादन में भारी निवेश की आवश्यकता होती है। लोगों में हरित ऊर्जा को लेकर जागरुकता का अभाव है, जिससे उपलब्ध क्षमता के बावजूद हरित ऊर्जा का दोहन काफी कम है।
- 2020 तक 175 गीगीवाट का लक्ष्य
भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा के नाम पर हरित ऊर्जा विकल्पों के सार्थक दोहन के लिए रणनीति तैयार की हुई है। इसके तहत 2022 तक 175 गीगावाट क्षमता स्थापित करने का लक्ष्य है। भारतीय वैज्ञानिक, नीतिनिर्माता और पर्यावरणविद भी हरित ऊर्जा की नई-नई तकनीकों और मॉडलों को तैयार करने में व्यस्त हैं। सौर, पवन और जल विद्युत प्रणालियों में विश्वसनीय और लागत प्रभावी प्रौद्योगिकी प्राप्त करने और सम्बद्ध सुविधाओं एवं क्षमताओं को विकसित और सुदृढ़ बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग किया जा रहा है। भारत की फोटोवोल्टिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सोलर पैनल निर्माण उद्योग को 210 अरब रुपए की सरकारी सहायता देने की योजना है। इस योजना के तहत भारत 2030 तक कुल ऊर्जा का 40 फीसदी हरित ऊर्जा से पैदा करने के लिये प्रतिबद्ध है।
Published on:
18 Feb 2020 05:04 am
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