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Guru Nanak Jayanti 2017: जहां पड़े चरण वहीं बन गए ऐतिहासिक गुरुद्वारे

गुरुनानक देवजी का 549वां ‘प्रकाश उत्सव’ 4 नवम्बर, 2017 को मनाया जा रहा है।

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Guru Nanak Dev ji

भोपाल । मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रकाश उत्सव गुरुद्वारा अरेरा कालोनी, भोपाल में श्रद्धा-भक्ति एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया। इसी के उपलक्ष्य में 1 नवम्बर बुधवार को सुबह 4.00 बजे प्रभात फेरी गुरुद्वारा अरेरा कालोनी से आरम्भ हुई जिसमें सैंकड़ों श्रद्धालुओं ने कहा कि धन गुरुनानक सारा जग तारया एवं हो रही है तेरी जय-जयकार, एक माह तक निकलने वाली प्रभात फेरियों का गुरुवार को समापन हुआ। वहीं 3 व 4 नवम्बर को गुरुद्वारा अरेरा कालोनी में शब्द कीर्तन गुरबानी का गायन हुआ।

जहां पड़े चरण वहां बने ऐतिहासिक गुरुद्वारे:
सिख धर्म के संस्थापक प्रथम पातशाह साहिब श्री गुरु नानक देव जी महान आध्यात्मिक चिंतक व समाज सुधारक थे। आपका जन्म राय भोईं की तलवंडी में पिता महिता कालू एवं माता तृप्ता के घर सन् 1469 ई. में हुआ। वास्तव में आपका अवतरण बैसाख शुक्ल पक्ष तृतीया को हुआ परन्तु सिख जगत में परंपरा अनुसार आपका अवतार पर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। अपनी चार उदादियों के दौरान आप विश्व के अनेक भागों में गए और मानवता के घर्म का प्रचार किया। पंजाब में आपके चरण जहां-जहां पड़े वहां आज ऐतिहासिक गुरुद्वारे सुशोभित हैं।

1. ननकाना साहिब : पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में स्थित शहर ननकाना साहिब का नाम ही गुरु नानक देव जी के नाम पर पड़ा है। इसका पुराना नाम 'राय भोई दी तलवंडी' था। यह लाहौर से 80 किमी दक्षिण-पश्‍िचम में स्थित है और भारत में गुदासपुर स्थित डेरा बाबा नानक से भी दिखाई देता है। गुरु नानक देव जी का जन्मस्थान होने के कारण यह विश्व भर के सिखों का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। महाराजा रणजीत सिंह ने गुरु नानक देव के जन्म स्थान पर गुरुद्वारे का निर्माण करवाया था।

2. श्री कंध साहिब : बटाला स्थित श्री कंध साहिब में गुरु जी की बारात का ठहराव हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार सम्वत 1544 यानी 1487 ईस्वी में गुरु जी की बारात जहां ठहरी थी वह एक कच्चा घर था, जिसकी एक दीवार का हिस्सा आज भी शीशे के फ्रेम में गुरुद्वारा श्री कंध साहिब में सुरक्षित है। इसके अलावा आज यहां गुरुद्वारा डेरा साहिब है, जहां श्री मूल राज खत्री जी की बेटी सुलक्खनी देवी को गुरु नानक देव जी सुल्तानपुर लोधी से बारात लेकर ब्याहने आए थे।

3. गुरुद्वारा गऊ घाट : गुरु नानक देव साहिब 1515 ईस्वी में इस स्थान पर विराजमान हुए थे। उस समय यह सतलुज दरिया के किनारे पर स्थित था। उस समय लुधियाना के नवाब जलाल खां लोधी अपने दरबारियों सहित गुरु जी के शरण में आए व गुरु चरणों में आग्रह किया है हे सच्चे पातशाह, यह शहर सतलुज दरियां किनारे स्थित है, इसके तूफान से शहरवासियों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। आप इस पर कृपा करें। उनके जबाव में गुरु महाराज ने कहा कि आप सभी सच्चे मन से पूजा अर्चना करें।

4. गुरुद्वारा नानकियाना साहिब : संगरूर से 4 किलोमीटर दूर गुरुद्वारा नानकियाणा साहिब को गुरु नानक देव और गुरु हरगोबिंद जी की चरण छोह प्राप्त है। सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में श्री गुरु नानक देव जी यहां आए थे। उस समय मंगवाल गांव वर्तमान गुरुद्वारा साहिब के करीब एक तालाब था जहां गुरु जी ने ग्रामीणों को उपदेश दिया था।

5. गुरुद्वारा बड़ तीर्थ : श्री गुरु नानक देव जी उदासियों के दौरान फाजिल्का के गांव हरिपुरा में रुके थे। उनके वहां आगमन के दौरान उनके पैरों की छाप आज भी यहां मौजूद है। जहां गुरुनानक देव जी ठहरे थे, वहां आज एक भव्य गुरुद्वारा बड़ साहिब बना हुआ है। देश के विभाजन से पूर्व बने इस गुरुद्वारे में हर अमावस्या और गुरुनानक देव जी के जन्मोत्सव व अन्य गुरुपर्व श्रद्धा व हर्षोल्लास के साथ मनाए जाते हैं।

6. श्री बेर साहिब : गुरु नानक देव जी ने अपने भक्ति काल का सबसे अधिक समय सुल्तानपुर लोधी में बिताया। यहां उनसे संबंधित अनेक गुरुद्वारे सुशोभित हैं। इनमें से प्रमुख हैं श्री बेर साबिह जहां आपका भक्ति स्थल था। गुरु जी ने यहां 14 साल 9 महीने 13 दिन तक भक्ति की। यहीं उनके बैठने के स्थल को भोरा साहिब कहते हैं। भोरा साहिब के निकट ही बेरी का एक पेड़ है जिसके बारे में मान्यता है कि गुरु जी ने अपने भक्त खरबूजे शाह के निवेदन पर उसे यहां लगाया था। 550 साल बाद भी यह हरीभरी है और अब काफी बड़े क्षेत्र में फैल गई है।

7. गुरुद्वारा संत घाट : बेर साहिब से तीन किलोमीटर क दूंरी पर है गुरुद्वारा संत घाट। गुरु जी यहां प्रतिदिन स्नान करने आते थे और एक दिन डुबकी लगा कर 72 घंटे के लिए आलोप हो गए। कहा जाता है कि इसी दौरान उन्हें दिव्य ज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने एक ओंकार के मूल मंत्र का उच्चारण किया।

8. श्री हट़ट साहिब : सुल्तानपुर लोढी में अपने ठहरकाव के दौरान नवाब दौलत खान लोधी के मोदी खाने में नौकरी की और लोगों को राशन की बिक्री करते समय इसी स्थान पर उन्होंने 'तेरा-तेरा' का उच्चारण किया था। उनके समय के 14 पवित्र बत्र्े आज भी यहां सुशोभित हैं।

9. श्री कोठड़ी साहिब : मोदीखाना के हिसाब में कुछ गड़बड़ी के आरोपों के बाद गुरु साहिब को इसी स्थान पर हिसाब के लिए बुलाया गया, जहां लोगों के लगाए इल्जाम बेबुनियाद साबित हुए और हिसाब कम की जगह ज्यादा निकला था।
10. श्री अंतरयाम्ता साहिब : यह वह स्थान है जहां मस्जिद में श्री गुरु नानक देव जी ने नवाब दौलत खान व उसके मौलवी को नमाज की अस्लियत बताई थी और उनसे कहा था कि भक्ति में तन के साथ मन का शामिल होना भी जरूरी है।
11. गुरु का बाग : गुरु जी अपने विवाह के बाद परिवार के साथ इस स्थान पर रहे। इस स्थान पर ही गुुरु साहिब जी के पुत्र बाबा श्री चंद एवं बाबा लख्मी दास का जन्म हुआ। इसी वजह से इस स्थान को गुरु का बाग कहते है।

गुरु पर्व आज, सजेंगे दरबार, होंगे लंगर - मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल शहर के गुरुद्वारों में प्रकाश पर्व के अवसर पर 4 नवंबर को सुबह ही कीर्तन होंगे और अटूट लंगर लगेगा। शुक्रवार से ही गुरुद्वारे आकर्षक रोशनी से दमकते नजर आए। समाज के प्रवक्ता गुरुचरण सिंघ अरोरा ने बताया, प्रकाश पर्व पर सिख पंथ के महान रागी जत्थे भाई साहब भाई हरदीप सिंघ अम्बाला हरियाणा से एवं सिख पंथ के महान विचारक भाई परगट सिंघ मोगा पंजाब द्वारा गुरुमत विचार प्रवचन देंगे।

रागी जत्था भाई बहादुर सिंघ एवं गुरुद्वारा के ग्रंथी भाई हरविन्दर सिंघ कथा, कीर्तन, प्रवचन के द्वारा हजारों श्रद्धालुओं को श्री गुरुनानक देवजी की स्तृति कर श्री गुरुग्रंथ साहब के चरणों में जोड़ेंगे।

श्री गुरु नानक देव जी एक विलक्षण व्यक्तित्व : गुरु जी के महान व्यक्तित्व के विषय में भाई गुरदास ने कहा है-'सतिगुरु नानकु प्रगटिआ मिटि धुंधु जग चानणु होआ।' यानि उनके आने से संसार से अज्ञान की धुंध समाप्त होकर ज्ञान का प्रकाश फैला।

चतुर्थ पातशाह गुरु रामदास जी ने गुरु नानक देव जी की शख्सियत के विषय में फरमाया-
जिथे उह जाए तिथै उह सुरखरू
ओस कै मुहि डिठै सभि पापी तरिआ।।
अर्थात गुरु नानक देव जी जहां जाते हैैं वहां सब संपूर्ण हो जाता है। आपके दर्शन करके सब पापी तर जाते हैैं।
पंचम पातशाह श्री गुरु अर्जन देव जी गुरु नानक देव पातशाह के विषय में उच्चारण करते हैैं-
संति संग लै चडि़ओ सिकार,
मिरग पकरे बिन घोर हथिआर।।
अर्थात गुरु नानक देव जी सत्संगत के हथियार लेकर शिकार करने निकले हैैं और मृग रूपी प्राणियों सहज में ही घेर लेते हैैं।
भाई गुरदास ने गुरु नानक देव जी के अद्भुत व्यक्तित्व के बारे में लिखा है-'जिथे बाबा पैर धरे, पूजा आसण थापण सोआ' अर्थात जहां भी गुरु नानक देव जी गए वहां पूजा स्थान बन गया।
दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 'बचित्तर नाटक' में कथन किया है कि कलियुग में श्री गुरु नानक देव जी ने ही धर्म चलाया और धर्म के खोजियों को सच्ची राह दिखाई-
तिन इह कल मो धरम चलायो।
सब साधन को राहु बतायो।।
जो ताके मारगि महि आए।
ते कबहू नहीं पाप संताए।।