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हाथरस और कनपुरिया नौटंकी शैली में पूछा सवाल – क्या सच बोलना इतना मुश्किल है?

भारत भवन में नाटक 'हरिश्चन्नर की लड़ाई' का मंचन  

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हाथरस और कनपुरिया नौटंकी शैली में पूछा सवाल - क्या सच बोलना इतना मुश्किल है?

हाथरस और कनपुरिया नौटंकी शैली में पूछा सवाल - क्या सच बोलना इतना मुश्किल है?

भोपाल। भारत भवन में अतिथि नाट्य प्रस्तुति के अंतर्गत गुरुवार को 'हरिश्चन्नर की लड़ाई' का मंचन हुआ। नाटक मौजूदा दौर में सच की स्थिति दर्शाने की कोशिश करता है। यदि आज राजा हरिश्चंद्र होते तो क्या सच बोल पाते। नाटक में मास्टर हरिया के किरदार के जरिए ये सवाल उठाया गया कि राजनीति हो या समाज, क्या सच बोलना इतना मुश्किल है कि हमें ऊंचे मुकाम पर पहुंचने के लिए झूल का ही सहारा लेना पड़ता है। डायरेक्टर का कहना है कि 1984 में संगीत नाटक अकादमी ने यंग डायरेक्टर्स के लिए एक स्कीम शुरू की थी।

जिसमें फोक बेस्ड नाटक तैयार करना था। देशभर से 8 डायरेक्टर चुने गए थे। मैने तभी ये नाटक तैयार किया था। इस नाटक में हाथरस और कनपुरिया शैली को जोड़ा है। हाथरस शैली में जहां वैष्णव संगीत का प्रभाव है, वहीं कनपुरिया नौटंकी शैली में पारसी थिएटर का। मैंने संगीत को जोड़कर एमैच्योर प्ले तैयार किया है। नाटक में गांव के प्रभाव को दिखाने के लिए मंच पर गांव के दृश्य और बाहरी दीवारों पर रंगहीन चित्र बनाए गए। बैकग्राउंड के दृश्यों को प्रभावी बनाने के लिए प्रोजेक्टर का यूज किया गया।

हरिश्चंद्र से प्रभावित होकर लेता है सच बोलने की प्रेरणा

मुख्य किरदार शिक्षक मास्टर हरिया गांव में नौंटकी करता है। हरिश्चंद्र का किरदार निभाने से उसे सच बोलने की आदत हो जाती है। यहीं से उसके जीवन का संघर्ष शुरू हो जाता है। नौटंकी के दौरान उसका पहला सामना एक कमिश्नर से होता है जो उसे ईनाम देना चाहते हैं। हरिया सवाल करता है कि क्या ईनाम का पैसा ईमानदारी का है। इससे कमिश्नर नाराज हो जाते हैं और शो खत्म होने के बाद उसे झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार कर लिया जाता है। जेल से बाहर आकर भी हरिया सच्चाई के रास्ते से हटने के लिए तैयार नहीं होता। स्कूल में बेटे के एडमिशन के लिए वह स्कूल के बेईमान और घूसखोर अधिकारियों से संघर्ष करता है।

अस्पताल के बाहर हो जाती है बेटे की मौत
सामाजिक व्यवस्था में सुधार और भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी लड़ाई तेज होती जाती है तो पुलिस, अफसर, नेता और पत्रकारों के एक वर्ग का गठजोड़ उसके खिलाफ खड़ा हो जाता है। इस बीच बेटा बीमार होता है तो अस्पताल के भ्रष्ट अधिकारी बिना पैसा लिए उसे एडमिट करने से मना कर देते हैं। अस्पताल के बाहर ही उसके बेटे की मौत हो जाती है। बाद में उसी सदमे के चलते उसकी पत्नी की भी मौत हो जाती है। कई लोग उसको सुझाव देते हैं कि वह व्यावहारिक बने और सत्य के नाम पर लडऩा बंद कर दे। लेकिन हरिया सत्य की लड़ाई के रास्ते पर अडिग खड़ा रहता है।