
Drama in shaheed bhavan
भोपाल। तीन दिवसीय 10वें भीष्म साहनी स्मृति नाट्य समारोह के तहत गुरुवार को शहीद भवन में भीष्म साहनी की कहानी पर आधारित विचारोत्तेजक नाटक 'चीफ की दावत' की प्रस्तुति हुई। इसका नाट्य रूपांतरण और निर्देशन मृदुला भारद्वाज ने किया।
नाटक में आज के भौतिक जीवन में गुम होते जा रहे मानवीय रिश्तों की उपयोगिता को दर्शाया गया है। अपनी संतान द्वारा तिरस्कृत और मानसिक पीड़ा झेलने वाले बुजुर्गों की दयनीय दशा पर हिंदी के कई कहानीकारों ने लेखनी चलाई है। भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत' भी इस कड़ी की एक संवेदनशील कहानी है। आज के उपभोक्तावादी युग में अधिकाधिक धन, यश, आराम आदि ही जीवन का चरम लक्ष्य माना जाता है। ऐसी हालत में पारिवारिक मूल्य खत्म होते जा रहे हैं और बूढ़े मां-बाप संतानों द्वारा उपेक्षित हो जाते हैं।
प्रमोशन पाने के लिए घर में होती है चीफ की दावत
'चीफ की दावत' एक अधिकारी शामनाथ की कहानी है। एक दिन वो अपने संस्थान के चीफ को घर दावत के लिए बुलाता है। शामनाथ और उसकी पत्नी चीफ की दावत में कोई कमी नहीं रखना चाहते हैं। घर में वो दिखावे की हर चीज तक ले आते हैं, लेकिन उनकी राह में एक सबसे बड़ा रोड़ा है और वो है उनकी वृद्ध मां। वो नहीं चाहते कि चीफ के आने के समय वो उनके सामने आए। नाटक में अंत में दिखाया गया कि किस तरह मां की मौजूदगी से चीफ की दावत की महफिल का पूरा रंग ही बदल जाता है।
इस बार डायलॉग्स बढ़ाए और गाने का किया प्रयोग
इससे पहले मंचित हुए इस नाटक में गानों का प्रयोग नहीं किया गया लेकिन इस बार नाटक में जब शामनाथ की मां घर के कोने में बुत बनी बैठी होती हैं और उनका सामना चीफ से होता तो एक गीत- नहीं जाणा, नहीं जाणा माई, ओहे नहीं जाणा... इस दृश्य को और भी प्रभावी बनाता है। निर्देशक मृदुला भारद्वाज ने बताया कि नाटक की मूल कहानी के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं की लेकिन इसकी अवधि बढ़ाने के लिए कुछ डॉयलॉग्स जरूर बढ़ाए। यह नाटक गहरा तो है लेकिन सही मायने में यह मौजूदा समाज का आईना है, आज भी ऐसे दृश्य परिवारों में देखने को मिल जाएंगे।
Published on:
29 Mar 2019 07:45 am
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