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दवाओं और सामग्री के वास्तविक रेट और MRP में ही सात गुना अंतर

- कंज्यूमेबल्स में सबसे ज्यादा मनमानी, लुटने को मजबूर मरीज

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भोपाल। राजधानी में भी दवाओं और मरीजों के इलाज में उपयोग की जाने वाले कंज्यूमेबल्स के मनमाने रेट चल रहे हैं। इनके एमआरपी और अस्पतालों को मिलने वाले वास्तविक रेट में भी जमीन आसमान का अंतर है। इसके बावजूद अस्पतालों में यह सामग्री या तो एमआरपी पर या उससे भी अधिक रेट में मरीजों को उपलब्ध कराई जाती है। एक ही दवा जिसका कंपोजीशन एक समान है उसके रेट्स में भी जमीन आसमान का अंतर है।

कंज्यूमेबल्स जैसे कैथेटर, आईवी सेट, केन्यूला आदि जैसी चीजों में सबसे ज्यादा लूट है। खास बात यह है कि राज्य शासन की किसी अथॉरिटी का इस पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए मरीज और उनके परिजन लुटने के लिए मजबूर हैं। नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी द्वारा निजी अस्पतालों द्वारा दवाओं और अन्य सामग्री पर कमाए जाने वाले मुनाफे की रिपोर्ट जारी की गई है। इसमें बताया गया है कि अस्पतालों द्वारा दवाओं और कंज्यूमेबल्स पर मरीजों से 1700 प्रतिशत तक मुनाफा कमाया जा रहा है। राजधानी के निजी अस्पतालों में भी यही स्थिति है।

राजधानी में 260 निजी नर्सिंग होम्स हैं। इन सभी ने अपने खुद के परिसर में ही मेडिकल स्टोर खोल रखे हैं। अधिकांश दवाएं और कंज्यूमेबल्स मरीजों के परिजनों को यहीं से खरीदना पड़ते हैं। पत्रिका ने मेडिकल स्टोर्स और अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिजनों से रेट्स के बारे में बात की तो उनमें जमीन आसमान का अंतर मिला।

दवाओं के दामों में भारी अंतर
अलग-अलग कंपनियों की एक ही कंपोजीशन की दवाओं की कीमत में भी जमीन आसमान का अंतर है। सिप्रोफ्लोक्सेसिन एंटीबायोटिक सिफेक्सेमाइन ब्रांड नेम से 500 एमजी की 10 टेबलेट जहां 300 रुपए की हैं वहीं महासेप 100 रुपए में मिलता है। विभिन्न कंपनियों के मॉक्सीफ्लोक्सेसिन आई ड्रॉप की कीमत 45 से 360 रुपए तक है। एलर्जी में उपयोग की जाने वाले सिटजिन एक कंपनी की 10 टेबलेट 36 रुपए की आती हैं तो दूसरी की मात्र 12 रुपए की मिल रही हैं। थोक में डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए इनका रेट मात्र चार रुपए है।

निजी अस्पतालों में यदि दवाओं और कंज्यूमेबल्स के रेट एमआरपी पर लिए जा रहे हैं तो इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। क्योंकि अस्पतालों के भी कई छिपे हुए खर्च होते हैं। यदि एमआरपी से ज्यादा रेट लिए जाते हैं तो यह आपत्तिजनक है और उन्हें एेसा नहीं करना चाहिए।

- डॉ उमेश शारदा, सचिव मप्र नर्सिंग होम्स एसोसिएशन

हम तो सिर्फ दवाओं के निर्माण करने वालों को लायसेंस जारी करते हैं। इसके साथ उसका निर्माण मानक स्तर पर हो इसकी निगरानी करते हैं। उनके रेट्स पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए रेट्स ज्यादा वसूले जाने संबंधी शिकायत पर कार्रवाई भी नहीं करते।
- ब्रजेश सक्सेना, जॉइंट कंट्रोलर फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन