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गोंड-कोरकू जनजाति में लड़का बनता है घर जमाई, लड़की के परिवार को मनाने बनता है लमझना

रवीन्द्र भवन में नाटक 'जमोला का लमझना' का मंचन

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भोपाल। संस्कृति पर्व-3 के अंतर्गत शनिवार को नाटक 'जमोला का लमझना' का मंचन किया गया। 'लमझना' गोंड, बैगा और कोरकू आदि जनजातियों में घर जमाई बनाने के लिए उपयुक्त वर के चयन की एक प्रथा है। इस जनजातीय प्रथा पर लक्ष्मीनारायण पयोधि द्वारा काव्य नाटक 'जमोला का लमझना' लिखा गया।

जिसका मंचन वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी के निर्देशन में रवींद्र भवन में शनिवार को किया गया। नाटक में पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर जीव-जगत के विस्तार तक की प्रक्रिया को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। एक घंटा 15 मिनट के इस नाटक में संस्कृति के विस्थापन की कहानी दिखाई गई।

क्या है लमझना
लमझना गोंड, बैगा और कोरकू आदि जनजातियों में प्रथा है कि यहां बेटियां पहले अपने पति के घर नहीं जाती, बल्कि दूल्हा घर आता है। लमझना उपयुक्त वर के चयन की प्रथा है। इसके अनुसार बेटी के लिए एक ऐसे युवक को घर में रखकर परखा जाता है, जो परिवार की जिम्मेदारी संभाल सके। परिवार की उम्मीदों पर खरा उतरने पर ही शादी की जाती है।

जमोला पसंद करने लगती है बुधरू को
इस नाटक में सुकमन द्वारा अपनी बेटी जमोला के लिए बुधरू को लमझना बनाकर लाया जाता है। बुधरू घर के सारे काम अपने भावी ससुर के बताए अनुसार करने की कोशिश करता है। जमोला और बुधरू हाट, बाजार और जंगल में महुआ बीनने भी जाते हैं। इस प्रकार की संगति से जमोला बुधरू से मन ही प्रेम करने लगती है।

खरा नहीं उतरता बुधरू पिता की कसौटी पर
जमोला का पिता सुकमन थोड़े कठोर स्वभाव का है। बुधरू उसकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता और वह उसे वापस उसके घर भेज देता है। जमोला को इस बात का पता चलते ही वह पिता से विद्रोह करती है और अपने प्रेम को वापस पाना चाहती है। अंत में जमोला का पिता बुधरू को वापस लाने के लिए मान जाता है और दोनों की शादी हो जाती है।