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लोक शैली के चित्रों में भारत की संस्कृति झलकती है

एकाग्र श्रृंखला गमक में व्याख्यान का आयोजन

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लोक शैली के चित्रों में भारत की संस्कृति झलकती है

लोक शैली के चित्रों में भारत की संस्कृति झलकती है

भोपाल. संस्कृति विभाग की एकाग्र श्रृंखला गमक में कालिदास संस्कृत अकादमी की ओर से चित्रकला की पारंपरिक लोकशैलियां एवं प्रयोग विषय पर वरिष्ठ चित्रकार महावीर वर्मा का व्याख्यान हुआ। इसका प्रसारण सोशल मीडिया पर किया गया। वरिष्ठ चित्रकार महावीर वर्मा ने कहा कि भारत एक विराट देश है और इसकी विविधवर्णी संस्कृति है। इसमें क्षेत्र के अनुसार विविध लोकचित्र शैलियां विकसित हुई। उनमें प्रमुख हैं मध्यप्रदेश की गोंड, संजा महाराष्ट्र की वार्ली, कर्नाटक की चितर बिहार की मधुबनी, उड़ीसा व बंगाल की पट्ट, आंध्रप्रदेश की कलमकारी, हिमाचल की कांगड़ा, राजस्थान की मांडना आदि प्रमुख हैं।

चित्रों में क्षेत्र की संस्कृति और विशेषता का प्रभाव

लोकचित्र कलाकारों द्वारा चित्रित चित्रों में उस क्षेत्र की संस्कृति और विशेषता का प्रभाव दिखाई देता है। जैसे कालाहस्ति शैली में आंखों का आकार बड़ा होता है। प्राकृतिक रंगों से अधिक अलंकृत किए जाते हैं। मधुबनी शैली में दोहरी रेखाओं के बीच रंगभर कर बिन्दुओं से सज्जा की जाती है। मालवा की संजा शैली में गोबर और फूलों से आकृतियों की सजावट होती है। फड़ शैली में महिलाओं को हरे नीले रंग से तथा पुरुषों को लाल रंग से प्रस्तुत किया जाता है। चितर शैली में चावल के आटे से चित्र बनाये जाते हैं। लोकचित्रों में जनजीवन पर्व त्योहारों का चित्रण सदियों से होता आ रहा है। लोक से ही शास्त्रीय परंपरा का विकास होता है। ऐसा हम मान सकते हैं। लोक शैली के चित्रों में भारत की संस्कृति झलकती है।
कला से होती है राष्ट्र की पहचान

वरिष्ठ चित्रकार मुकेश बिजौले ने कहा कि किसी भी राष्ट्र की पहचान वहां की कला एवं संस्कृति से होती है। ललित कलाएं मानवीय संवेदनाओं को सीधे हृदय तक सम्प्रेषित करती हैं। भारत में क्षेत्रों के अनुसार लोकचित्र शैलियां विकसित हुई।