26 अप्रैल 2026,

रविवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

एक किस्सा: कांग्रेस का वो नेता जिसे राजीव गांधी ने एयरपोर्ट पर ही बना दिया था मुख्यमंत्री

एक किस्सा: कांग्रेस का वो नेता जिसे राजीव गांधी ने एयरपोर्ट पर ही बना दिया था मुख्यमंत्री

6 min read
Google source verification

भोपाल

image

Pawan Tiwari

Mar 10, 2019

ek kissa

एक किस्सा: कांग्रेस का वो नेता जिसे राजीव गांधी ने एयरपोर्ट पर ही बना दिया था मुख्यमंत्री

भोपाल. एक हिंदी अखबार का पत्रकार था। दूसरा पिता की हार का बदला लेने के लिए सियासत के मैदान में उतरा था। बगावत दोनों ने की थी। सिक्का मध्यप्रदेश की सियासत में ऐसा चला की मुख्यमंत्री भी बने। पार्टी हाई कमान के खास भी रहे तो सियासी खेल के चाणक्य भी कहे गए। एक किस्सा में आज हम आपको बताएंगे मध्यप्रदेश के दो ऐसे नेताओं के किस्से जिन्होंने विधायकी से लेकर मुख्यमंत्री और फिर राज्यपाल तक का सफर तय किया। पहले बात एक पत्रकार की। अखबरों में नेताओं की कई हेडलाइन छपती हैं पर मध्यप्रदेश का एक लड़का हेडलाइन लिखते-लिखते सियासत के लिए खुद बड़ी हेड लाइन बन गया था।

डीपी मिश्रा ने दिया था ऑफर
एक हिंदी अखबार का पत्रकार जो प्रदेश का मुख्यमंत्री बना। जिसने अपने राजनीतिक आका के खिलाफ ही खुली बगावत की तो नरसिम्हा राव और सोनिया का विश्वस्त रहा। नाम है मोतीलाल वोरा। जन्म राजस्थान में हुआ पर सियासी धार मध्यप्रदेश में लगी। घर का खर्च चलाने के लिए पढ़ाई के बाद मोतीलाल वोरा मध्यप्रदेश में एक हिन्दी अखबार के पत्रकार बन गए। साइकल से चलते थे और अखबार के लिए खबरें भेजते थे। सियासत में दिलचस्पी बढ़ी तो प्रजा समाजवादी पार्टी से जुड़ गए। 1968 में दुर्ग से पार्षदी का चुनाव लड़ा जीत भी मिली। सियासत की असली चमक दिखी 1972 में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने थे। उस वक्त पूर्व सीएम द्वारका प्रसाद मिश्र दुर्ग में कांग्रेस के लिए नया उम्मीदवार खोज रहे थे। कारण था वहां के मौजूदा विधायक मोहनलाल बाकलीवाल, द्वारिका प्रसाद मिश्र के विरोधी खेमे मूलचंद देशलहरा गुट में शामिल हो गए थे। एक नेता ने सलाह दी एक पार्षद है जो चुनाव जीत सकता है पर कांग्रेसी नहीं है। मिश्र ने कहा कांग्रेसी बना देंगे नाम बताओ। नेता ने कहा- मोतीलाल वोरा डीपी मिश्र ने संदेश भिजवाया। वोरा ने संदेश पर तुंरत सहमति जताई और खेमा बदलकर कांग्रेसी हो गए। चुनाव लड़ा जीत भी मिली और पहली बार विधानसभा पहुंचे।

लेकिन डीपी मिश्र सीएम नहीं बने। सीएम की कुर्सी मिली इंदिरा दरबार से भेजे गए प्रकाशचंद सेठी को। वोरा ने एक बार फिर खेमा बदला। डीपी का खास नेता अब सेठी का करीब हो गया था। करीबी होने का इनाम भी मिला। प्रकाशचंद सेठी ने वोरा को राज्य परिवहन निगम का उपाध्यक्ष नियुक्त किया। यहां फिर किस्मत ने वोरा का साथ दिया। परिवहन निगम के अध्यक्ष थे सीताराम जाजू। उनकी उम्र अधिक हो गई थी और अस्वस्थ रहते थे। अब वोरा उनके भी खास बन चुके थे। जाजू ने सारा काम वोरा को सौंप दिया। वोरा मध्यप्रदेश राज्य परिवहन को पहली बार घाटे से उबार कर फायदे में ले आए।


जब दिग्गज हारे तब वोरा जीते
1977 में देश में आपातकाल के बाद फिर से चुनाव हुए। प्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी। कांग्रेस के कई दिग्गज हार गए। हारने वालों मे श्यामाचरण शुक्ल जैसे नेता भी शामिल थे। मगर वोरा कांग्रेस विरोधी लहर में भी दुर्ग से रिकॉर्ड वोटों से जीते। 1980 में कांग्रेस की सरकार बनी। मुख्यमंत्री बने अर्जुन सिंह। आप इस नाम को याद रखियेगा। मध्यप्रदेश की सियासत में इस नेता को चाणक्य कहा जाता था। अटल जैसे दिग्गज भी अर्जुन सिंह की सियासी चाल में फंसकर चुनाव हार गए थे। अर्जुन सिंह के सीएम बनते ही वोरा के दिमाग में मंत्री बनने का ख्याल आया। मंत्री बनने के लिए वोरा को एक बार फिर से खेमा बदलना था। अब प्रकाशचंद सेठी के खेमे से अर्जुन सिंह के खेमे में शामिल होना था। खेमा बदलने की सियासत में मोतीलाल बोरा ने मास्टरी कर ली थी। इस बार भी उनका दांव फिट बैठा। एक साल तक वोरा अर्जुन सिंह के चक्कर लगाने लगे...वोरा की वफादारी से अर्जुन खुश हुए पर अर्जुन की खुशी का कारण कुछ और ही था।

अर्जुन सिंह ने 1981 में मोती लाल वोरा को अपनी कैबिनेट में उच्च शिक्षा विभाग का राज्यमंत्री बनाया। वोरा के हाथ मानो अलादीन का जादुई चिराग लग गया हो। वोरा ने कई फैसले लिए। कॉलेज खोले, कई निजी कॉलेजों का अधिग्रहण किया। इनके इन फैसलों से प्रदेश सरकार की जमकर तारीफ हुई। अर्जुन ने भी 1983 में प्रमोशन किया। राज्यमंत्री से कैबिनेट मिनिस्टर बना दिया।

टर्निंग प्वाइंट 1985 में
साल था। 1985 अर्जुन सिंह के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस की बड़ी जीत मिली। अर्जुन सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने लेकिन दिल्ली में एक मीटिंग हुई। इस मीटिंग की वजह मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल की सूची तय करना बताया गया। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह को एक ऑफर दिया। अर्जुन सिंह को मानना पड़ा क्योंकि फैसला हाई कमान का था। राजीव ने कहा- दिल्ली छोड़ने से पहले दो नाम बताओ फिर पंजाब पहुंच जाओ। अर्जुन सिंह राजीव गांधी के साथ मीटिंग करके कमरे से बाहर निकलते हैं और कहते हैं जिस जहाज से मैं दिल्ली आया था उसे तुंरत भोपाल भेजा जाए। अर्जुन सिंह अपने बेटे अजय सिंह को फोन किया। कहा- वोरा को लेकर दिल्ली आओ। वोरा रास्ते में अजय सिंह से अर्जुन सिंह के कैबिनेट में मंत्री पद पाने के लिए सिफारिश करते रहे।

एयरपोर्ट में राजीव ने की घोषणा
दिल्ली एयरपोर्ट से वोरा सीधे मध्यप्रदेश भवन पहुंचे। वहां अर्जुन सिंह, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह उनका इंतजार कर रहे थे। खाने के टेबल पर लंबी चर्चा हुई इस दौरान एक फोन आया। पीएम राजीव गांधी रूस की यात्रा के लिए एयरपोर्ट पहुंच रहे हैं। अर्जुन सिंह मोतीलाल वोरा के साथ एयरपोर्ट पहुंचे। राजीव ने वोरा को अपने पास बुलाया कहा- मोतीलाल वोरा जाओ अब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालो।

मध्यप्रदेश की सियासत के लिए अर्जुन के पास मोती लाल वोरा के रूप में एक तुरूप का इक्का हाथ लग गया था। अर्जुन सिंह राज्य के ठाकुर-ब्राह्मण समीकरण साधने के लिए एक भरोसेमंद ब्राह्मण चेहरे की जरूरत थी। जिसे मोतीलाल वोरा ने पूरी कर चुके थे। जिस कारण कभी अर्जुन सिंह और श्रीनिवास तिवारी में दुश्मनी खत्म नहीं हुई। बगावत थी अर्जुन सिंह और मोतीलाल वोरा की हाइ कमान से। मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद मोतीलाल वोरा अपना खेमा बनाने लगे। अर्जुन सिंह को इसकी भनक लगी। अर्जुन सिंह अब एमपी में वापसी के लिए कोशिश करने लगे। दिल्ली में दखल देना शुरू किया, राजीव गांधी को एक बार फिर से भरोसे में लिया। इसके बाद फरवरी 1988 में अर्जुन सिंह मध्यप्रदेश लौट आए। लौटते ही सीएम पद की शपथ दिलाई गई। तो मोतीलाल वोरा को दिल्ली बुलाया गया। मोतीलाल वोरा और अर्जुन में अनबन बढ़ने लगी थी। मोतीलाल वोरा ने एक बार फिर खेमा बदला। इस बार उन्होंने खुद को सिंधिया खेमे में फिट किया। नाम आगे किया तो माधवराव सिंधिया के नाम का भी प्रस्ताव लाया गया। राजीव ने डैमेज कंट्रोल के लिए एक बार फिर से मध्यप्रदेश की कमान मोतीलाल वोरा को सौंप दी। ये तो बात थी मोतीलालवोरा के बगावत की।

अब बात अर्जुन सिंह के बगावत की। राजीव गांधी के बाद नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने थे। अर्जुन सिंह और नसरिंह राव के बीच अनबन थी। बाबरी मस्जिद की घटना के बाद अर्जुन सिंह ने कांग्रेस औऱ तत्तकालीन पीएम नरसिंह राव के खिलाफ खुली बगावत की थी। बाद में उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया था।

राजीव और अर्जुन सिंह की मीटिंग में क्या हुआ था

राज्यपाल से पहले बात करते हैं अब उस मीटिंग की जो राजीव और अर्जुन सिंह के बीच हुई थी। तारीख थी 11 मार्च 1985। राजीव गांधी ने सिख दंगों के बाद अर्जुन सिंह को पंजाब का राज्यपाल बनाने का फैसला किया था। राजीव गांधी के एक ऑफर की भी बात हमने की थी। राजीव गांधी ने अर्जुन सिंह से कहा- पंजाब जाने से पहले अपनी पसंद के सीएम और प्रदेश अध्यक्ष का नाम बताओ और फिर पंजाब जाओ। इसके बाद ही अर्जुन सिंह ने दिल्ली से भोपाल के लिए प्लेन भेजा था और बेटे अजय सिंह को मोतीलाल वोरा को लेकर दिल्ली आने को कहा था। अब बारी कांग्रेस अध्यक्ष को चुनने की थी। क्योकिं जब मोतीलाल वोरा मध्यप्रदेश के सीएम बनाए गए थे उस वक्त वो मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे। अध्यक्ष के लिए अर्जुन सिंह ने दिग्विजय सिंह का नाम आगे बढ़ाया। राजीव गांधी ने हां कर दी। अर्जुन सिंह ने जो चहा वही हुआ। वोरा सीएम बने तो दिग्विजय मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष।

वोरा के मुख्यमंत्री बनने के बाद मंत्रिमंडल बनाने की बारी आई। यहां भी अर्जुन सिंह की चली। वोरा कुछ नहीं कर पाए। कहते हैं एक समय ऐसा था जब मध्यप्रदेश की सरकार चंड़ीगढ़ के राजभवन से चलती थी। मोती लाल वोरा को भी कांग्रेस ने 1996 में उत्तर प्रदेश का राज्यपाल नियुक्त किया। और फिर सबको याद है कि गेस्ट हाउस कांड में किस तरह वोरा ने मायावती को बचाने में भूमिका निभाई थी।