
भोपाल। भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अब केवल दो दिन ही शेष बचे हैं। देश में कई घरों में बाल गोपाल भगवान श्री कृष्ण के जन्म उत्सव को मनाने की तैयारियां भी जोर-शोर से आरंभ हो गई हैं । हिन्दुओं के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व का बहुत महत्व है। देश भर में जन्माष्टमी वाले दिन को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और दुश्मनों पर विजय प्राप्त करने को लेकर कई कथाएं हैं जो बेहद ही प्रसिद्ध हैं और जिन्हें आज भी लोगों में खूब पंसद किया जाता है।
यह है श्री कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व:
मथुरा में कंस नाम का एक निर्दयी राजा राज करता था वहां की प्रजा उससे काफी दुखी थी । राजा कंस की एक छोटी बहन थी जिसका नाम देवकी था, जिसे वह बहुत प्यार करता था। राजा कंस ने अपनी बहन राजकुमारी देवकी की शादी वासुदेव के साथ करा दी। उसी दिन अचानक आकाश से एक भविष्यवाणी हुई कि देवकी का आठवां पुत्र उसकी कंस की मृत्यु का कारण बनेगा । यह सुनने के बाद कंस ने अपनी बहन राजकुमारी देवकी और वासुदेव को बंदी बना लिया और दोनों को कई सालों के लिए अपने कारागार में डाल दिया। जहां देवकी ने कृष्ण को जन्म दिया।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के वक्त भगवान के निर्देशानुसार वासुदेव कृष्ण को नंद और यशोदा के पास वृंदावन ले गए थे। उस दिन बहुत भयानक तूफान और बारिश थी वासुदेव ने श्रीकृष्ण को एक टोकरी में अपने सिर पर रखकर नदी पार की इस दौरान शेषनाग ने श्रीकृष्ण की बारिश से रक्षा की। वासुदेव ने कृष्ण को नंद को सौंप दिया और वहां से एक बच्ची के साथ लौट आए जिसका जन्म भी उसी दिन हुआ था। इसके बाद जब कंस ने इस बच्ची को मारने की कोशिश की तो यह बच्ची देवी स्वरूप हवा में उड़ गई और फिर से कंस को उसकी मृत्यु को लेकर चेतावनी सुनाई दी। कुछ सालों बाद भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध कर मथुरावासियों को उसके शासने से मुक्ति दिलाई।
जन्माष्टमी व्रत, भोग और पूजा विधि :
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के भक्त पूरी विधि-विधान के साथ व्रत करते हैं। वे श्री कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सिर्फ एक बार ही भोजन करते हैं। व्रत वाले दिन इनके सभी भक्त पूरे दिन का उपवास करने का संकल्प लेते हैं और अगले दिन अष्टमी तिथि खत्म होने के बाद अपना व्रत तोड़ते हैं। जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण का जल ,दूध, और घी से अभिषेक किया जाता है। भगवान कृष्ण को भोग चढ़ाया जाता है। व्रत वाले दिन भक्त अन्न का सेवन नहीं करते इसकी जगह फल और पानी लेते हैं जिसे फलाहार कहा जाता है।
जन्माष्टमी तिथि और शुभ मुहूर्त :
स्मार्त संप्रदाय के अनुसार जन्माष्टमी 14 अगस्त को मनाई जाएगी तो वहीं वैष्णव संप्रदाय के 15 अगस्त को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाएगा।
जन्माष्टमी 2017
14 अगस्त
निशिथ पूजा : 12:03 से 12:47
निशिथ चरण के मध्यरात्रि के क्षण है : 12:25 बजे
15 अगस्त पराण:
शाम 5:39 के बाद
अष्टमी तिथि समाप्त: 5:39
Published on:
12 Aug 2017 01:08 pm
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