11 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

catch_icon

प्लस

epaper_icon

ई-पेपर

profile_icon

प्रोफाइल

TASTE: नबाब भी थे इसके दीवाने, 300 साल पुराने हैं ये 200 कबाब

भोपाल में कबाब का कल्चर निजाम युग से माना जाता है। राजा भोज का कार्यकाल समाप्त होते तब यहां निजामों की सभ्यता पैर जमा चुकी थी और उन्ही ने लजीज कबाब का स्वाद पहली बार भोपाल का चखाया

3 min read
Google source verification

image

Juhi Mishra

Jan 21, 2016

kabab

kabab


भोपाल। बड़ा तालाब, वीआईपी रोड, जंगलों से घिरी पहाडिय़ां, चौक बाजार की रौनक और लजीज कबाबों की खुशबू, ये सब भोपाल की शान हैं। यहां नवाबों का दौर था, पर आज वो दौर तो नहीं हैदम तोड़ती नवाबों की इमारतों के बीच कुछ जिंदा है तो उस जमाने का लजीज खाना। जी हां, भोपाल के कोने-कोने में आज भी उन नवाबी व्यंजनों की खुशबू महकती रहती है। इन्हीं व्यंजनों में से एक हैं नवाबी दौर के कबाब, जो लगभग 300 साल से आज भी वैसे ही हैं, जैसे भोपाल के पहले नवाब के वक्त थे।

निजाम काल में लगभग तीन सदी पहले कबाबों का चलन शुरू हुआ। आज पुराने भोपाल की चटोरी गलियों में कबाब की 200 से ज्यादा वैरायटी पकायी जाती हैं। मास्टर शेफ विकास खन्ना और संजीव कपूर भी यहां के कबाब के शौक़ीन हैं।



तलवार पर पकाया था पहला कबाब
जानकार बताते हैं कि भोपाल में कबाब का कल्चर नबावों के सैनिकों ने शुरू किया। दरअसल वे युद्ध के दौरान कई महीनों तक अपने घर से बाहर होते थे। कभी-कभी जंगलों में दिन गुजारने पड़ते थे। ऐसे में खाने के लिए जानवरों का गोश्त ही हुआ करता था। सैनिक गोश्त को तलवार में फंसाकर आग के ऊपर सेंका करते थे। बाद में यही चलन सीक कबाब के रूप में प्रचलित हो गया। इसके बाद कीमे को अपनी ढ़ाल पर सेंकना शुरू किया जिसने आगे चलकर शामी कबाब की किस्में तैयार की। इसके बाद कबाब नवाबी रसोई का अहम हिस्सा बन गए। जो कबाब जंग के मैदान में बिना मसालों के पकाए जाते थे वे नवाबों की रसोई में मसालों के साथ पकने लगे।


अफगान के मसालों से महकी रसोई
अफगानिस्तान का चपली कबाब, ईरान का कबाब कूबिदे और ग्रीस शक्श कबाब भी भोपाल में निजाम शासकों के समय ही आया। जैसे-जैसे नवाबों के मुगलों से संबंध दोस्ताना हुए वैसे-वैसे उनके खाने के तौर तरीके निजामी रसोईयों में इस्तेमाल किए जाने लगे। नवाबों की रसोई में अफगानिस्तान और ईरान के मांसाहारी मसालों का खूब इस्तेमाल किया जाता था।



सबसे ज्यादा यहां हुए प्रयोग
भोपाल में नवाबी काल से अब तक कबाबों को लेकर सबसे ज्यादा एक्सपेरीमेंट हुए हैं। अपने शो की लॉचिंग के दौरान भोपाल आए मास्टर शेफ विकास खन्ना ने कहा था कि जैसे हैदाराबाद में बिरयानी के एक्सपेरिमेंटल टेस्ट मिलते हैं वैसे ही भोपाल में कबाबों के डिफरेंट टेस्ट हैं। भोपाल में सीक कबाब की 38 और शामी कबाब की 45 वैरायटी मिलती हैं। इसके अलावा तगंड़ी कबाब, रोस्ट कबाब और तंदूरी कबाब की 80 से ज्यादा वैरायटी और टेस्ट हैं।


यहां से आती है कबाब की महक
पुराने भोपाल की तंग गलियों में शाम से देर रात तक कबाबों की महक आती रहती है। बड़े रेस्ताओं में जाने की बजाए लोग इन चटोरी गलियों में आना ज्यादा पसंद करते हैं। बुधवारा में जुम्मन मियां के कबाब और इतवारा में खान चाचा की रसोई कबाबों की सबसे ज्यादा वैरायटी परोसने के लिए फेमस है। इसके अलावा जामा मस्जिद और चौक बाजार की गलियां भी शाम 7 बजे से गरमा-गरम कबाब की खुशबू से महकने लगतीं हैं। यहां कबाब की दर्जनों चौपाटियां हैं, जहां हर शाम कबाब खाने के शौकीनों की भीड़ जमा होती है और घंटों लाइन में लगने के बाद मनचाहा नवाबी कबाब हाथ में होता है।